मप्र पुलिस के कुनबे में 62 आईपीएस अधिकारियों के तबादले को केवल प्रशासनिक रूटीन मानना बड़ी भूल होगी। यह फैसला कई मायनों में सरकार की प्राथमिकताओं, दबावों और रणनीति का संकेत देता है। खासकर जब 19 जिलों के एसपी एक साथ बदले गए हों, तो यह स्पष्ट है कि सरकार कानून-व्यवस्था को लेकर ‘एक्शन मोड’ में है। सबसे पहला मायना है-जवाबदेही तय करना। सिंगरौली की बैंक डकैती और सिवनी के हवाला कांड के बाद संबंधित एसपी को हटाना बताता है कि अब घटनाओं की जिम्मेदारी सीधे जिला पुलिस प्रमुखों पर तय की जा रही है। यह संदेश पूरे पुलिस महकमे के लिए है कि लापरवाही या कमजोर नियंत्रण की कीमत पद से चुकानी पड़ सकती है। दूसरा बड़ा संकेत है-संवेदनशील जिलों पर फोकस। जिन जिलों में अपराध, विवाद या राजनीतिक संवेदनशीलता अधिक है, वहां नए अधिकारियों की तैनाती से सरकार स्थिति पर पकड़ मजबूत करना चाहती है। भिंड-मुरैना जैसे इलाकों में बदलाव इसी रणनीति का हिस्सा हैं। तीसरा मायना-परफॉर्मेंस और प्रमोशन का संतुलन। कई अधिकारियों को डीआईजी स्तर की जिम्मेदारी देना यह दिखाता है कि सरकार सिर्फ सजा नहीं, बल्कि बेहतर काम करने वालों को आगे बढ़ाने का संदेश भी दे रही है। यानी ‘अच्छा काम करो, आगे बढ़ो- चूक करो, हटो’ की नीति। चौथा पहलू है-राजनीतिक और प्रशासनिक संतुलन। बड़े स्तर पर तबादले अक्सर सरकार की अपनी प्रशासनिक पकड़ मजबूत करने का तरीका भी होते हैं। भरोसेमंद और सक्षम अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाकर सरकार अपने एजेंडे को जमीन पर लागू करना चाहती है। लेकिन इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है, लगातार तबादलों से पुलिसिंग की स्थिरता प्रभावित होती है। अधिकारी क्षेत्र को समझने से पहले ही बदल दिए जाते हैं, जिससे दीर्घकालिक सुधार की प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है। यह पुलिस के कुनबे में इस बड़े बदलाव में स्पष्ट संदेश है कि, सरकार अब परिणाम चाहती है। अगर नए अधिकारी इस चुनौती को अवसर में बदलते हैं, तो यह कदम कानून-व्यवस्था में सुधार का टर्निंग पॉइंट बन सकता है, अन्यथा यह भी महज एक और ‘बड़ी सूची’ बनकर रह जाएगा।
-मिलिंद ठाकरे

