भारतीय राजनीति में कुछ किले ऐसे माने जाते रहे हैं, जिन पर जीत हासिल करना लगभग असंभव समझा जाता था। पश्चिम बंगाल भी ऐसा ही एक किला था। पहले वामपंथ का अभेद गढ़ और फिर तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में ममता बनर्जी का मजबूत साम्राज्य। लेकिन इस बार के जनादेश ने इस ‘अजेय’ माने जाने वाले मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। भाजपा ने न सिर्फ सत्ता हासिल की, बल्कि बंगाल की राजनीति की दशकों पुरानी धुरी को ही बदल दिया। यह जीत केवल सीटों की संख्या का खेल नहीं है, बल्कि एक गहरे राजनीतिक परिवर्तन का संकेत है। कभी 3 सीटों तक सीमित रही भाजपा का 200 के पार पहुंचना यह दर्शाता है कि उसने जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत किया और मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाई। यह बदलाव रातों-रात नहीं आया, बल्कि वर्षों की रणनीति, नेतृत्व और लगातार प्रयासों का परिणाम है। इस जीत का सबसे बड़ा संदेश यह है कि लोकतंत्र में कोई भी ‘सर्वशक्तिमान’ और स्थायी रूप से ‘अजेय’ नहीं है। वामपंथी दलों का 34 वर्षों का शासन भी अंततः समाप्त हुआ था, और अब ममता बनर्जी का मजबूत किला भी ढह गया। यह बताता है कि जनता समय-समय पर सत्ता परिवर्तन के जरिए संतुलन बनाती रहती है। हालांकि, इस ऐतिहासिक जीत के साथ भाजपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बंगाल की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता, क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीतिक संवेदनशीलता को समझते हुए सरकार चलाना आसान नहीं होगा। उम्मीदें भी उतनी ही बड़ी हैं जितनी यह जीत। पश्चिम बंगाल का यह जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक युग परिवर्तन का संकेत है। ‘अजेय’ के मिथक के टूटने के साथ यह भी स्पष्ट हो गया है कि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के हाथ में ही होती है। जनता ही सर्व शक्तिमान है। जनता ही समय आने पर हर किले की दीवारें गिरा सकती है।
-मिलिंद ठाकरे

