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साल के अंत तक 60 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकता है ब्रेंट क्रूड

नई दिल्ली। वैश्विक कच्चे तेल बाजार को लेकर सिटीग्रुप (Citigroup Inc.) ने बड़ा अनुमान जारी किया है। निवेश बैंक का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात सामान्य बने रहे और तेल की आपूर्ति बाधित नहीं हुई, तो साल 2026 के अंत तक ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमत घटकर 60 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।

फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड लगभग 71 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड करीब 68 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा है। ऐसे में कीमतों में संभावित गिरावट भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए राहत भरी खबर मानी जा रही है।

क्यों गिर सकती हैं कच्चे तेल की कीमतें?

अमेरिका के प्रमुख निवेश बैंक सिटीग्रुप के विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव कम होने के बाद समुद्री व्यापार धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। जहाजों की आवाजाही बढ़ने से वैश्विक सप्लाई चेन में सुधार आया है, जिससे कच्चे तेल की उपलब्धता बढ़ रही है। सप्लाई बढ़ने का सीधा असर कीमतों पर पड़ रहा है और बाजार में लगातार नरमी देखने को मिल रही है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में लॉजिस्टिक्स से जुड़ी चुनौतियां और कम होंगी, जिससे तेल बाजार में स्थिरता लौट सकती है।

युद्ध के दौरान रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा था क्रूड

पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिला था।  एक समय ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया था। हालांकि अब हालात सामान्य होने के साथ कीमतें फिर से युद्ध-पूर्व स्तर के आसपास लौट आई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भू-राजनीतिक तनाव दोबारा नहीं बढ़ता, तो आने वाले महीनों में कीमतों में और गिरावट संभव है।

सिर्फ सिटीग्रुप ही नहीं, बल्कि गोल्डमैन सैक्स और मॉर्गन स्टेनली भी पहले ही कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का अनुमान जता चुके हैं। दोनों वैश्विक वित्तीय संस्थानों का मानना है कि पश्चिम एशिया में हालात सामान्य होने और प्रमुख समुद्री मार्गों पर आवागमन बहाल होने से तेल की सप्लाई मजबूत होगी, जिससे कीमतों पर दबाव बना रहेगा। मॉर्गन स्टेनली ने तो हाल के महीनों में ब्रेंट क्रूड के अपने अनुमान में दो बार कटौती भी की है।

भारत को कैसे मिलेगा फायदा?

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में गिरावट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि क्रूड ऑयल सस्ता होता है तो—

  • भारत का आयात बिल कम हो सकता है।
  • पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव घट सकता है।
  • महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।
  • उद्योगों और परिवहन क्षेत्र की लागत कम हो सकती है।
  • चालू खाते के घाटे पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।

हालांकि घरेलू ईंधन कीमतों में बदलाव का फैसला कई अन्य आर्थिक और सरकारी कारकों पर भी निर्भर करता है।

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