मुंबई: स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बॉक्स ऑफिस पर इमरान हाशमी की ‘आवारापन 2’ और सनी देओल की ‘बंटवारा 1947’ आमने-सामने हैं। दोनों फिल्मों की कहानी और जॉनर अलग हैं, लेकिन दर्शकों के बीच इनकी तुलना शुरू हो गई है। एक ओर 19 साल पुराने किरदार शिवम पंडित की वापसी है, तो दूसरी ओर 1947 के बंटवारे और इंसानियत की कहानी।
‘आवारापन 2’: इमरान हाशमी की वापसी, लेकिन कहानी कमजोर
‘आवारापन 2’ में इमरान हाशमी एक बार फिर शिवम पंडित के किरदार में नजर आते हैं। कहानी में शिवम गुमनाम जिंदगी जी रहा होता है, तभी भारतीय इंटरपोल अधिकारी समर्थ उसे बैंकॉक के चाइल्ड ट्रैफिकिंग रैकेट में फंसे बच्चों को बचाने के मिशन में शामिल करता है।
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इमरान हाशमी की एक्टिंग है। उन्होंने शिवम पंडित के किरदार में वही पुरानी इंटेंसिटी बरकरार रखी है। हालांकि, कमजोर स्क्रीनप्ले और प्रिडिक्टेबल ट्विस्ट फिल्म के असर को कम करते हैं।
पहली ‘आवारापन’ के गाने दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए थे, लेकिन सीक्वल का संगीत उस पुराने जादू को दोहराने में कामयाब नहीं होता। शबाना आजमी अपने किरदार में प्रभाव छोड़ती हैं, लेकिन उन्हें ज्यादा स्क्रीन स्पेस नहीं मिला है।
‘बंटवारा 1947’: विभाजन की त्रासदी के बीच इंसानियत की कहानी
दूसरी तरफ ‘बंटवारा 1947’ 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी है। फिल्म में सनी देओल सिकंदर मिर्जा के किरदार में हैं, जो दंगों के बाद अपने परिवार के साथ भारत छोड़कर लाहौर पहुंचता है।
परिवार को रहने के लिए एक हवेली मिलती है, लेकिन वहां पहले से एक बुजुर्ग हिंदू महिला माई (शबाना आजमी) रह रही होती हैं। माई अपना घर छोड़ने से इनकार कर देती हैं। इसके बाद दो परिवारों की कहानी धर्म और बंटवारे से आगे बढ़कर इंसानियत और रिश्तों की कहानी बन जाती है।
फिल्म का पहला हिस्सा कुछ धीमा है, लेकिन सेकंड हाफ में कहानी रफ्तार पकड़ती है। सनी देओल के दमदार डायलॉग और भावनात्मक दृश्य प्रभाव छोड़ते हैं।
शबाना आजमी ने फिर जीता दिल
‘बंटवारा 1947’ में शबाना आजमी का अभिनय सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। माई के किरदार में उनकी भावनात्मक अदायगी फिल्म की जान बन जाती है। सनी देओल भी इस बार आक्रोश के साथ-साथ इमोशनल अंदाज में नजर आते हैं। प्रीति जिंटा की वापसी भी प्रभावी है।
फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट इसका इंसानियत और भाईचारे का संदेश है। कहानी धर्म से ऊपर इंसानी रिश्तों को रखने की बात करती है।
कौन सी फिल्म भारी?
अगर एक्शन, इमरान हाशमी की इंटेंसिटी और पुरानी ‘आवारापन’ का नॉस्टैल्जिया पसंद है तो ‘आवारापन 2’ आकर्षित कर सकती है। लेकिन मजबूत कहानी की तलाश कर रहे दर्शकों को फिल्म कुछ जगह निराश कर सकती है।
वहीं ‘बंटवारा 1947’ की ताकत इसकी भावनात्मक कहानी, शबाना आजमी और सनी देओल की एक्टिंग और इंसानियत का संदेश है। फिल्म की शुरुआत धीमी जरूर है, लेकिन दूसरा हिस्सा ज्यादा प्रभावी है।

