नई दिल्ली: सीजेपी प्रदर्शन के बाद दिल्ली में पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की हिरासत और प्रतिबंधों पर सुप्रीम कोर्ट ने जवाब मांगा। अदालत ने मेट्रो सेवाएं सामान्य रखने के निर्देश दिए और 47 बंद स्टेशनों का नक्शा तलब किया। इंटरनेट बहाली और बैरिकेडिंग पर भी सुनवाई हुई।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने संबंधित अधिकारियों को मंगलवार तक जवाब और आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि मेट्रो सेवाएं सामान्य समय-सारणी के अनुसार चलनी चाहिए। हालांकि, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून के तहत लागू प्रतिबंध प्रभावी रह सकते हैं।
57 से घटकर 47 हुए बंद मेट्रो स्टेशनों की संख्या
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि शुरुआत में 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने का प्रस्ताव था, लेकिन अदालत के आदेश के बाद यह संख्या घटकर 47 रह गई। पीठ ने अधिकारियों से इन स्टेशनों की स्थिति स्पष्ट करने और उनकी भौगोलिक स्थिति दर्शाने वाला नक्शा पेश करने को कहा।
अदालत को बताया गया कि पिछली रात 10 बजे से सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए हैं और कोई भी स्टेशन आंशिक रूप से बंद नहीं है। पीठ ने रेलवे अधिकारियों की ओर से जारी परामर्शों के बारे में भी जानकारी मांगी, ताकि प्रतिबंधों के असर और सार्वजनिक परिवहन की स्थिति का आकलन किया जा सके।
इंटरनेट बहाली पर भी उठा सवाल?
सुनवाई में दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं के निलंबन का मुद्दा भी उठा। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि इंटरनेट सेवाएं पिछली रात से बहाल हैं। पीठ ने इस बयान को रिकॉर्ड पर लेने की बात कही।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रदर्शनकारियों की हिरासत के साथ इंटरनेट प्रतिबंधों पर सवाल उठाए। उन्होंने अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले का हवाला दिया, जिसमें इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध से जुड़े कानूनी सिद्धांतों पर विचार किया गया था।
पूरी दिल्ली से बैरिकेड हटाने की मांग
सुनवाई के दौरान दिल्ली में बैरिकेडिंग और नागरिकों की आवाजाही पर लगी पाबंदियों का मुद्दा भी उठा। वकीलों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर बैरिकेड लगाए गए हैं और दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचने में भी बाधाएं आ रही हैं।
अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भगवान दास रोड पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू होने से संबंधित बोर्ड का जिक्र किया। वहीं, कपिल सिब्बल ने प्रतिबंधात्मक आदेशों का दायरा सीमित करने की मांग की। सुनवाई में यह सवाल भी उठाया गया कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर लगाए गए प्रतिबंध आम लोगों की आवाजाही को किस हद तक प्रभावित कर रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की कार्रवाई पर सवाल?
वरिष्ठ अधिवक्ता शहदान फरासत ने प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के कथित व्यवहार का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारियों को घसीटकर बसों में बैठाया गया और कुछ लोगों को बसों से बाहर फेंका गया। इन आरोपों के जरिए पुलिस की कार्रवाई और हिरासत की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए।
वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने भी नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही पर लगी पाबंदियों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में लोगों के लिए शहर में स्वतंत्र रूप से आना-जाना मुश्किल हो गया है। ये आरोप और दलीलें याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में रखी गईं।
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धारा 163 के आदेशों और हिरासत को चुनौती
कपिल सिब्बल ने प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए लोगों से जुड़ी याचिकाओं पर दलीलें पेश कीं। उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत जारी प्रतिबंधात्मक आदेशों को चुनौती देने वाले पक्ष की ओर से आरोप लगाया कि लोगों को ट्रेनों समेत अलग-अलग स्थानों से हिरासत में लिया जा रहा है।
सुनवाई के दौरान अदालत के प्रति विश्वास खोने संबंधी सिब्बल की टिप्पणी का मुद्दा भी उठा। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि भविष्य में किसी वरिष्ठ अधिवक्ता को अदालत के बारे में इस तरह की टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि वह वकीलों को ऐसी टिप्पणी करने से रोकने का आदेश नहीं दे सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से मेट्रो स्टेशनों की स्थिति, प्रतिबंधों और अपने आदेशों के अनुपालन पर रिपोर्ट मांगी है। सुनवाई में मेट्रो सेवाओं की सामान्य बहाली के साथ इंटरनेट कनेक्टिविटी, पुलिस कार्रवाई और नागरिकों की आवाजाही से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे।

