नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच कीर्ति चक्र से सम्मानित रिटायर्ड मेजर दिग्विजय सिंह रावत का बयान चर्चा में आ गया है। उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और विपक्ष के प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट लिखी है। इसमें उन्होंने प्रदर्शन के तरीके और इसके पीछे की राजनीतिक मंशा पर सवाल उठाए हैं?

शनिवार और रविवार को CJP के विरोध प्रदर्शन के बाद सोमवार को INDIA गठबंधन की ओर से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने की तैयारी की खबरों के बीच मेजर रावत ने अपनी चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि मौजूदा प्रदर्शन में शाहीन बाग आंदोलन जैसा तरीका अपनाया जा रहा है।
शाहीन बाग आंदोलन से की तुलना
मेजर रावत ने अपनी पोस्ट में आरोप लगाया कि वामपंथी संगठनों और विपक्ष के कुछ धड़ों की ओर से एक बार फिर शाहीन बाग जैसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने प्रशांत भूषण के कथित बयान का जिक्र करते हुए कहा कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने CJP पर पुलिसकर्मियों को निशाना बनाने और उनकी छवि खराब करने के आरोप भी लगाए। हालांकि, ये उनके व्यक्तिगत आरोप हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
मुसलमानों के इस्तेमाल को लेकर उठाए सवाल?
रावत ने दावा किया कि विपक्षी नेता और उनके सहयोगी पंजाब तथा हरियाणा से प्रदर्शनकारियों को जुटा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मुस्लिम कलाकार, पत्रकार और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर इस आंदोलन से जुड़ रहे हैं।
उनका आरोप है कि राजनीतिक माहौल बनाने के लिए मुस्लिम समुदाय का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि अगर स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई तो राजनीतिक विरोध सांप्रदायिक तनाव में बदल सकता है। इसके लिए उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में हुए प्रदर्शनों का उदाहरण दिया।
दिल्ली में आमने-सामने आ सकते हैं विरोधी गुट
मेजर रावत ने कहा कि भाजपा का संगठनात्मक नेटवर्क काफी बड़ा है। ऐसे में यदि विरोध प्रदर्शन बढ़ता है तो दूसरी ओर से भी लोग सड़कों पर उतर सकते हैं। उनका मानना है कि विरोधी समूहों के आमने-सामने आने से झड़प, संपत्ति को नुकसान और जानमाल की हानि का खतरा पैदा हो सकता है।
उन्होंने वर्ष 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा का भी जिक्र किया। रावत ने कहा कि राजनीतिक विवादों के बीच उन आम लोगों और उनके परिवारों को नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने हिंसा में अपनों को खोया था।
आम जनता को न चुकानी पड़े राजनीतिक संघर्ष की कीमत
अपनी पोस्ट के आखिर में रावत ने कहा कि राजनीतिक नेता और विचारधाराओं से जुड़े लोग समय के साथ आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन हिंसा का नुकसान आम नागरिकों और उनके परिवारों को लंबे समय तक उठाना पड़ता है।
उनके बयान के बाद विरोध प्रदर्शन के तरीकों और शांति व्यवस्था को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है। ऐसे में किसी भी आंदोलन के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखना और हिंसा से बचना जरूरी है।

