भोपाल: देश को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना है तो स्वदेशी उत्पादों को अपनाना होगा। जब हम अपने देश में बनी वस्तुओं का उपयोग करेंगे तभी देश का पैसा देश में रहेगा और स्थानीय उद्योगों को ताकत मिलेगी। इसी संदेश के साथ मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय परिसर में चल रहे स्वदेशी मेले के तीसरे दिन वक्ताओं ने लोगों से ‘वोकल फॉर लोकल’ को जीवन में उतारने का आह्वान किया।
शासकीय मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय परिसर में स्वदेशी जागरण मंच और स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन की ओर से आयोजित मेला 24 अक्टूबर से 4 नवंबर तक चल रहा है। मेले का मुख्य उद्देश्य लोगों को देश में बने उत्पादों से रूबरू कराना और स्वदेशी खरीददारी के लिए प्रेरित करना है।
स्वदेशी को आचरण में उतारने की जरूरत
अतिथि किशन सूर्यवंशी ने कहा कि बचपन से हम सुनते आए हैं कि भारत सोने की चिड़िया था और अंग्रेज यहां से धन लूटकर ले गए। उस समय भारत में बनने वाले उत्पादों की गुणवत्ता अच्छी थी और भारतीय वस्तुएं विश्वभर में प्रसिद्ध थीं। भारत आत्मनिर्भर था, लेकिन बाद में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) जैसी संस्थाओं के आने और विदेशी वस्तुओं के प्रति आकर्षण बढ़ने से स्वदेशी उत्पादों के इस्तेमाल में कमी आई।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वदेशी और स्थानीय उत्पादों का इस्तेमाल करना होगा। इन उत्पादों का निर्यात भी बढ़ाना चाहिए। केवल स्वदेशी की बात करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने आचरण में भी इसे अपनाना होगा। पहले विदेशी वस्तुओं की दुकान लगती थीं, अब स्वदेशी मेले आयोजित हो रहे हैं। लेकिन केवल मेला लगाने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, लोगों को यहां से खरीदारी भी करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पहले भारत रक्षा क्षेत्र में रूस जैसे देशों से हथियार खरीदता था, लेकिन अब डीआरडीओ जैसी संस्थाएं देश में ही रक्षा उपकरण बना रही हैं। आज भारत चिप से लेकर जहाज तक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आर्थिक मजबूती भी जरूरी: संजय नागेश
अतिथि संजय नागेश ने कहा कि वर्ष 1989-90 का समय भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण मोड़ था। उस दौर में विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं के गठन और उदारीकरण की प्रक्रिया के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वदेशी के विचार को आगे बढ़ाने के लिए मंच तैयार किए। राजनीतिक मजबूती के साथ आर्थिक मजबूती भी जरूरी है।
नागेश ने कहा कि लॉर्ड मैकाले ने भारत की शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जिनका उद्देश्य ऐसी शिक्षा पद्धति तैयार करना था जिसमें पढ़ने वाला व्यक्ति दिखने में भारतीय हो, लेकिन उसकी सोच अंग्रेजों जैसी हो।
मेला संयोजक सतीश विश्वकर्मा ने कहा कि स्वदेशी मेला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि देशभक्ति का मंच है। यहां ऐसी स्वदेशी कंपनियों को अपने उत्पाद लोगों तक पहुंचाने का अवसर मिलता है, जिन्हें बड़े मंचों पर पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती। विदेशी कंपनियों के सामान खरीदने से देश का पैसा बाहर जाता है।
चित्रकला प्रतियोगिता में 30 बच्चों ने लिया हिस्सा
मेले के दूसरे दिन रविवार को पर्यावरण विषय पर चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की गई। इसमें तीन आयु वर्गों के 30 बच्चों ने हिस्सा लिया।
- 5 से 10 वर्ष: श्रीजता शाह प्रथम, तनिष्क भंगेल द्वितीय, नक्षत्रा गौर तृतीय
- 11 से 16 वर्ष:कनक सक्सेना प्रथम, मानव लांगर द्वितीय, मुस्कान सरोरिया तृतीय
- 17 से 25 वर्ष: दीपशिखा मिश्रा प्रथम, अंशु तिवारी द्वितीय, ऋचा द्विवेदी तृतीय
तीनों वर्गों में राज यादव, मोहिनी चौधरी और पूर्णिमा अहिरवार को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। सभी 30 प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।
रविवार को सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कथक नृत्य, बांसुरी और तबला वादन तथा आराधना ग्रुप की ओर से सुगम संगीत की प्रस्तुतियां दी गईं।
कार्यक्रम में स्वदेशी जागरण मंच के मध्य क्षेत्र संयोजक सुधीर दाते, श्रीकांत भदौरिया, सीमा भारद्वाज, दीपक वर्मा, रमन तिवारी और विनय कुमार सोनी सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे।
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आज के कार्यक्रम
मेले में सोमवार को भारत के लोक नृत्य दर्शन, देशभक्ति गीत और भजन संध्या के कार्यक्रम होंगे। कार्यक्रम में भाजपा के मध्य प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत प्रांत मंत्री अतिथि के रूप में शामिल होंगे।

