नई दिल्ली/बालाघाट: नई दिल्ली में आयोजित 12वें BRICS संसदीय मंच में बालाघाट-सिवनी सांसद भारती पारधी ने भारत का प्रतिनिधित्व कर मध्यप्रदेश का मान बढ़ाया। मंच पर उन्होंने वियतनाम की नेशनल असेंबली की सदस्य और वियतनामी प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख डॉ. थाई क्विन्ह माई डुंग का आत्मीय स्वागत किया, जिसे भारत-वियतनाम मैत्री में नए अध्याय के तौर पर देखा जा रहा है।
संसदीय कूटनीति से बढ़ेगा सहयोग
सांसद पारधी ने कहा कि संसदीय कूटनीति विभिन्न देशों के जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद और सहयोग बढ़ाने का सबसे प्रभावी माध्यम है। इससे साझा वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहन मिलता है।
ऐतिहासिक रिश्तों पर रखा जोर
उन्होंने भारत और वियतनाम के बीच ऐतिहासिक मैत्री, पारस्परिक विश्वास और रणनीतिक साझेदारी के महत्व को रेखांकित किया। दोनों देशों के संबंध साझा सभ्यतागत मूल्यों, सांस्कृतिक संपर्कों और क्षेत्रीय शांति व समृद्धि के प्रति साझा प्रतिबद्धता पर आधारित हैं।
वैश्विक मंच पर विचारों का आदान-प्रदान
इसके जरिए साझा वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए सामूहिक प्रयासों को भी प्रोत्साहन मिलता है। उन्होंने कहा कि भारत और वियतनाम के संबंध साझा सभ्यतागत मूल्यों, ऐतिहासिक सांस्कृतिक संपर्कों तथा क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और समृद्धि के प्रति साझा प्रतिबद्धता पर आधारित हैं। BRICS संसदीय मंच जैसे बहुपक्षीय आयोजन विभिन्न देशों की संसदों को आर्थिक विकास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक सुशासन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचारों के आदान-प्रदान का अवसर प्रदान करते हैं।
यह भी पढ़ें: दीप्ति शर्मा का अनोखा सफर: हॉकी की गेंद से सीखा छक्के लगाना, आज T20 इंटरनेशनल की सबसे सफल गेंदबाज
जन-जन के संबंध होंगे मजबूत
सांसद भारती पारधी ने विश्वास जताया कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय आयोजन भारत और वियतनाम के बीच संसदीय सहयोग, संस्थागत सहभागिता और जन-जन के संबंधों को और अधिक मजबूत बनाने में मील का पत्थर साबित होंगे।उन्होंने कहा कि संसदीय कूटनीति विभिन्न राष्ट्रों के बीच विश्वास निर्माण, साझा हितों की समझ और वैश्विक सहयोग को नई दिशा देने का सशक्त माध्यम है।
गौरतलब है कि 12वें BRICS संसदीय मंच में सांसद पारधी की सक्रिय सहभागिता और वियतनामी प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख का आत्मीय स्वागत, भारत-वियतनाम के दशकों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों को और प्रगाढ़ बनाने तथा वैश्विक स्तर पर संसदीय संवाद को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

