इस्लामाबाद। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई हाई-प्रोफाइल शांति वार्ता से दुनिया को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन पहला दौर बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो गया। हालांकि ईरान ने इसे पूरी तरह विफलता मानने से इनकार किया है और संकेत दिए हैं कि बातचीत आगे भी जारी रह सकती है। दूसरी तरफ अमेरिका ने साफ कहा कि ईरान समझौते की दिशा में कदम नहीं बढ़ा रहा।
शर्तों की लड़ाई
सूत्रों के मुताबिक, वार्ता के टूटने की सबसे बड़ी वजह दोनों देशों की कड़ी और टकराती शर्तें रहीं। ईरान चाहता था कि बातचीत शुरू होने से पहले ही उस पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटा दिए जाएं और पिछले नुकसान की भरपाई की जाए।
वहीं डोनाल्ड ट्रंप की नीति के अनुरूप अमेरिका ने परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल नियंत्रण और क्षेत्रीय गतिविधियों पर सख्त शर्तें रख दीं, जिन्हें ईरान ने ‘एकतरफा दबाव’ करार दिया।
भरोसे का संकट बना सबसे बड़ा रोड़ा
वहीं दोनों देशों के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी इस वार्ता पर भारी पड़ी। ईरान का आरोप है कि अमेरिका पहले भी समझौतों से पीछे हट चुका है, जबकि अमेरिका ईरान पर दोहरी नीति अपनाने का आरोप लगाता है। यही ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ बातचीत को आगे बढ़ने से रोकता रहा।
साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य भी इस विवाद का बड़ा केंद्र बना हुआ है। यह वैश्विक तेल आपूर्ति का अहम मार्ग है। जिसके लेकर अमेरिका चाहता है कि यह मार्ग पूरी तरह खुला रहे, जबकि ईरान इसे अपनी रणनीतिक ताकत के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी अनिश्चितता बनी हुई है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता पर सवाल
बता दें पाकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, लेकिन उसकी सीमित कूटनीतिक ताकत और दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद इस पहल को मजबूत आधार नहीं दे सके।

