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किरनापुर में ‘सिस्टम’ स्विच ऑफ: अवैध उत्खनन मामले में सवालों से बचते दिखे जिम्मेदार अधिकारी

जप्त JCB-ट्रैक्टर छोड़ने पर उठे सवाल, TI ने नहीं उठाया फोन; SDM और नायब तहसीलदार के नंबर बंद

बालाघाट। किरनापुर तहसील क्षेत्र में अवैध उत्खनन को लेकर चल रही कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। मौके से जप्त की गई JCB और ट्रैक्टर-ट्रॉली को कुछ ही घंटों में छोड़े जाने की सूचना के बाद जब मीडिया ने संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेनी चाही, तो संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया। घटनाक्रम ने न केवल कार्रवाई की प्रक्रिया बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

सूत्रों के अनुसार, क्षेत्र में लगातार मिल रही शिकायतों के बाद राजस्व अमले द्वारा मौके पर पहुंचकर कार्रवाई की गई थी। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कार्रवाई के दौरान मशीनों को विधिवत रूप से जप्त किया गया और मौके पर आवश्यक दस्तावेजी प्रक्रिया भी प्रारंभ की गई। हालांकि, कुछ ही घंटों में इन मशीनों के छोड़े जाने की जानकारी सामने आई, जिससे पूरे मामले की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।

फोन कॉल अनुत्तरित, नंबर स्विच ऑफ

पूरे घटनाक्रम पर आधिकारिक पक्ष जानने के लिए जब थाना प्रभारी (TI) किरनापुर से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो कई बार कॉल किए जाने के बावजूद फोन रिसीव नहीं किया गया। वहीं अनुविभागीय अधिकारी (SDM) का मोबाइल नंबर लगातार स्विच ऑफ मिला, जिससे स्थिति और अधिक उलझनपूर्ण हो गई।

तहसील स्तर पर संपर्क करने पर तहसीलदार ने मामले की जानकारी से अनभिज्ञता जताई और कार्रवाई नायब तहसीलदार के स्तर की बताई। लेकिन नायब तहसीलदार से संपर्क का प्रयास भी सफल नहीं रहा और उनका मोबाइल भी बंद पाया गया। एक ही मामले में कई जिम्मेदार अधिकारियों का एक साथ संपर्क से बाहर होना कई तरह के सवाल खड़े करता है।

जप्ती के बाद रिहाई पर उठे प्रश्न

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, अवैध उत्खनन में संलिप्त मशीनों को मौके पर जप्त किया गया था। ऐसे में अल्प समय में उनके छोड़े जाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत जप्त की गई मशीनरी को निर्धारित नियमों के अनुसार पंचनामा, जुर्माना और वैधानिक कार्यवाही पूरी होने के बाद ही छोड़ा जाता है। ऐसे में इतनी शीघ्र रिहाई किन परिस्थितियों में संभव हुई, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।

यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या इस प्रक्रिया में सभी नियमों का पालन किया गया या फिर किसी विशेष परिस्थिति में निर्णय लिया गया।

कार्रवाई कब हुई?

जप्ती की आधिकारिक एंट्री किस समय दर्ज की गई? रिहाई का आदेश किस अधिकारी द्वारा और किस आधार पर दिया गया? इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल, दस्तावेजी जानकारी सार्वजनिक नहीं होने से संदेह और गहरा गया है।

स्थानीय जानकारों का यह भी कहना है कि क्षेत्र में अवैध उत्खनन की गतिविधियां पहले भी सामने आती रही हैं, लेकिन हर बार कार्रवाई के बाद स्थिति जस की तस बनी रहती है। ऐसे में यह मामला केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक बड़े पैटर्न की ओर संकेत करता हुआ भी देखा जा रहा है।

प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल

जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क नहीं हो पाना और स्पष्ट जानकारी का अभाव, पूरे मामले में पारदर्शिता को लेकर संदेह उत्पन्न करता है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि कार्रवाई नियमानुसार हुई है, तो इसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से साझा की जानी चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की भ्रांति या अफवाह की स्थिति न बने।

प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर ऐसे मामलों में जो सीधे तौर पर राजस्व और कानून व्यवस्था से जुड़े हों।

जांच और जवाबदेही की मांग

अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि इस मामले में क्या संज्ञान लिया जाता है। क्या जप्त मशीनों की रिहाई नियमानुसार हुई? क्या पूरे घटनाक्रम की जांच कर जिम्मेदारी तय की जाएगी? क्या संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण लिया जाएगा? यदि जांच होती है, तो इससे न केवल इस मामले की सच्चाई सामने आएगी, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को भी रोका जा सकेगा।

साइड बॉक्स: जिम्मेदारों की खामोशी पर सवाल

एक ही मामले में संबंधित कई अधिकारियों से संपर्क नहीं हो पाना प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। ऐसे में सूचना का अभाव कई तरह की आशंकाओं को जन्म देता है।

सोशल मीडिया शॉर्ट अपडेट

किरनापुर में अवैध उत्खनन पर कार्रवाई के बाद जप्त JCB-ट्रैक्टर छोड़े जाने का मामला गरमाया। जवाब के लिए संपर्क करने पर कई जिम्मेदार अधिकारियों के फोन नहीं लगे। क्या है पूरी सच्चाई? जांच की मांग तेज।

मैडम का मोबाइल भी हुआ ‘गुल’

सूत्रों का दावा है कि जब नायब तहसीलदार द्वारा कार्रवाई की जा रही थी, तब वे लगातार फोन पर सक्रिय थीं। लेकिन जैसे ही गाड़ियों को छोड़ने की खबर फैली और मीडिया ने संपर्क करना चाहा, उनका मोबाइल भी स्विच ऑफ हो गया। अधिकारियों का इस तरह सामूहिक रूप से गायब (Contact-less) हो जाना यह साबित करने के लिए काफी है कि पर्दे के पीछे कोई बड़ा ‘खेल’ हुआ है।

राजस्व को चपत, माफिया को संरक्षण

स्थानीय जानकारों का कहना है कि यह पूरा घटनाक्रम अवैध कारोबारियों को बचाने और शासन के राजस्व को भारी नुकसान पहुँचाने की सोची-समझी साजिश है। अगर कार्रवाई नियमानुसार हुई थी, तो अधिकारी मीडिया के सवालों का सामना करने से क्यों कतरा रहे हैं? मोबाइल बंद कर लेना और जानकारी देने से बचना यह दर्शाता है कि किरनापुर में रसूखदारों के आगे सिस्टम ने घुटने टेक दिए हैं।

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