प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की बचत, सादगी और संयम अपनाने की अपील की। यह केवल भाषण नहीं था, बल्कि उन्होंने स्वयं अपने काफिले को छोटा कर उसका पालन भी किया। मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी अपने वाहन काफिले में कटौती कर साफ संदेश दिया कि सत्ता का मतलब दिखावा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। जब शीर्ष नेतृत्व खुद उदाहरण प्रस्तुत करे, तब पार्टी के नेताओं और पदाधिकारियों से भी उसी अनुशासन की अपेक्षा स्वाभाविक हो जाती है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कुछ नेताओं ने इस संदेश को गंभीरता से लेने के बजाय शक्ति प्रदर्शन का अवसर बना लिया। भिंड में भाजपा किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष सज्जन सिंह यादव का सैकड़ों वाहनों वाला काफिला और पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष सौभाग्य सिंह का 700 गाड़ियों के साथ भोपाल पहुंचना इसी मानसिकता को उजागर करता है। यह केवल ईंधन की बर्बादी का मामला नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक है जिसमें पद मिलते ही सादगी पीछे छूट जाती है। ऐसे मामलों में पार्टी नेतृत्व द्वारा की गई कार्रवाई स्वागतयोग्य है। किसी को पद से हटाना और किसी के अधिकार सीमित करना यह दर्शाता है कि संगठन अब केवल अपील तक सीमित नहीं रहना चाहता। जब नेतृत्व स्वयं अनुशासन का पालन करे और फिर भी निचले स्तर पर दिखावे की राजनीति जारी रहे, तब सख्ती जरूरी हो जाती है। वरना जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि नियम केवल आम लोगों के लिए हैं। हालांकि, इसके बावजूद कुछ नेताओं के लंबे काफिले अब भी सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं। इससे साफ है कि राजनीतिक कार्यकर्ता शक्ति प्रदर्शन की अपनी पुरानी मानसिकता को छोड़ने को राजी नहीं हैं। दूसरी ओर, कुछ जनप्रतिनिधियों ने साइकिल, बस, ई-स्कूटी और ई-रिक्शा से यात्रा कर सकारात्मक उदाहरण भी दिए हैं। असल जरूरत अब प्रतीकात्मकता से आगे बढ़ने की है। सादगी केवल कैमरों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित न रहे, बल्कि राजनीतिक व्यवहार का हिस्सा बने। जब शीर्ष नेतृत्व ने नजीर पेश कर दी है, तब संगठनात्मक अनुशासन बनाए रखने के लिए सख्ती ही सबसे प्रभावी संदेश साबित होगी। अनुशासन हीनों पर ऐसी कार्रवाइयां होते रहना जरूरी है।
-मिलिंद ठाकरे

