धार की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद आखिरकार सुलट ही गया। मप्र हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कहा है कि भोजशाला माँ वाग्देवी अर्थात सरस्वती का मंदिर है। यह निर्णय केवल किसी धार्मिक स्थल की पहचान तय करने तक सीमित नहीं, बल्कि इतिहास, पुरातत्व और न्यायिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाएगा। भोजशाला लंबे समय से आस्था और दावों के टकराव का केंद्र रही है। एक पक्ष इसे माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता रहा, तो दूसरा पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा। वर्षों तक अदालतों में चली बहस, राजनीतिक बयानबाजी और सामाजिक तनाव के बीच आखिरकार न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की वैज्ञानिक रिपोर्ट, ऐतिहासिक तथ्यों और स्थापत्य साक्ष्यों को आधार बनाकर अपना निर्णय सुनाया। इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने केवल भावनाओं को नहीं, बल्कि प्रमाणों को प्राथमिकता दी। अयोध्या मामले में अपनाए गए न्यायिक सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि धार्मिक और ऐतिहासिक विवादों का समाधान तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही संभव है। अदालत ने मुस्लिम पक्ष की नमाज संबंधी याचिकाओं को खारिज किया, वहीं जैन समाज के उस दावे को भी स्वीकार नहीं किया, जिसमें भोजशाला को जैन तीर्थ बताया गया था। भोजशाला केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता की अमूल्य धरोहर भी है। माना जाता है कि राजा भोज के समय यह विद्या, कला और संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केंद्र थी। माँ वाग्देवी से जुड़ी यह आस्था सदियों से जनमानस में जीवित रही है। ऐसे में अदालत का यह फैसला उन ऐतिहासिक मान्यताओं को भी मजबूती देता है, जिन्हें लंबे समय से प्रमाणित करने की मांग उठती रही। हालांकि, इस फैसले के बाद सबसे बड़ी जिम्मेदारी समाज और प्रशासन दोनों की है। किसी भी न्यायिक निर्णय को सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का माध्यम नहीं बनने देना चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार और एएसआई को प्रबंधन एवं संचालन की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश देकर संतुलन और संवेदनशीलता का परिचय दिया है। न्यायालय का यह फैसला एक बार फिर साबित करता है कि इतिहास की सच्चाइयों को लंबे समय तक दबाया जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता और न कैसे भी उसे झुठलाया जा सकता है।
-मिलिंद ठाकरे

