बालाघाट। जिले के विकास के नाम पर चुनाव के बाद जिस प्रकार ‘एकजुटता’ का प्रदर्शन किया गया, अब वही राजनीतिक गलियारों में सवालों के घेरे में आ गया है। सांसद से लेकर विधायक तक अनेक मंचों पर एक साथ दिखाई दिए, विकास के बड़े-बड़े दावे किए गए, जिले को नई दिशा देने की बातें हुईं। कई मौकों पर जिले के छह विधायक एक साथ बैठकर ‘बालाघाट हित’ की रणनीति बनाते भी नजर आए।
लेकिन अब आम जनता के बीच चर्चा इस बात की है कि यह एकजुटता वास्तव में जिले के विकास के लिए थी या फिर खुद के आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए?
सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, जिले में रेत ठेके के बाद जिस प्रकार सत्ता और विपक्ष के नेताओं की चुप्पी देखने को मिली, उसने कई सवाल खड़े कर दिए। बताया जा रहा है कि रेत ठेकेदार द्वारा एक पूर्व विधायक के फार्म हाउस में आयोजित रात्रिभोज में जिले के छह विधायक, सांसद, कुछ पूर्व विधायक और उनके प्रतिनिधि शामिल हुए। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर रही कि वहां ‘विकास’ नहीं बल्कि ‘बराबरी की हिस्सेदारी’ पर सहमति बनी और उसी के बाद रेत ठेके को लेकर विरोध की आवाजें लगभग शांत हो गईं।
जनता के बीच यह भी चर्चा रही कि यदि रेत ठेका वास्तव में जनविरोधी था, तो फिर जिले के जनप्रतिनिधियों ने खुलकर सड़क पर उतरकर विरोध क्यों नहीं किया? कहीं-कहीं विरोध हुआ भी तो वह केवल औपचारिकता तक सीमित दिखाई दिया। दूसरी ओर ठेकेदार का कारोबार लगातार फलता-फूलता रहा और अवैध वसूली तथा मनमानी के आरोप भी लगातार लगते रहे।
इस पूरे मामले में बालाघाट विधायक के पति पूर्व सांसद द्वारा भी कई मंचों से नाराजगी जताई गई। उन्होंने यहां तक आरोप लगाए कि “बेटा ठेकेदार/माफिया के घर पैसे लेने जाता है, शर्म आनी चाहिए।” इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया, लेकिन उसके बावजूद कथित वसूली और सांठगांठ के आरोप थमते नजर नहीं आए।
बालाघाट विधायक नगर पालिका में ही सीमट गई
वहीं दूसरी ओर नगर पालिका को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। जनचर्चा यह भी है कि बालाघाट विधायक पूर्व में नगर पालिका अध्यक्ष रह चुकी हैं और नगर पालिका में किस प्रकार काम होते हैं तथा भ्रष्टाचार की कार्यप्रणाली क्या होती है, इसकी उन्हें पूरी जानकारी है। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि अपने ढाई साल के कार्यकाल में उन्होंने नगर पालिका के मामलों में अपने विधायक प्रतिनिधियों के माध्यम से विरोध का माहौल बनाया, लेकिन कुछ समय बाद वही मुद्दे शांत हो गए। इससे आम लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि विरोध केवल दिखावे के लिए किया जाता है और बाद में समझौते की राजनीति हावी हो जाती है।
हालांकि जिले के कुछ जागरूक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों द्वारा लगातार विरोध दर्ज कराया गया। वहीं ठेका लेने वाले लोगों के बीच बढ़ते मनमुटाव और आपसी संघर्ष के चलते आखिरकार ठेकेदार को ठेका सरेंडर करना पड़ा।
लेकिन अब जनता सवाल पूछ रही है कि यदि विरोध पहले दिन से ईमानदारी से होता, तो क्या जिले की नदियों का यह हाल होता? क्या रेत माफियाओं का इतना बोलबाला होता? और क्या विकास के नाम पर नेताओं की यह “एकजुटता” केवल राजनीतिक और आर्थिक समझौते का माध्यम बनकर रह गई?
बालाघाट की राजनीति में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि जिले के विकास की तस्वीर से ज्यादा नेताओं की ‘मिलीभगत’ की तस्वीर मजबूत दिखाई दे रही है। जनता सब देख रही है, समझ रही है और आने वाले समय में इन्ही नेताओं को जवाब देना होगा, मगर तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होंगी l

