देश में आरक्षण व्यवस्था सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा माध्यम मानी जाती है। इसका मूल उद्देश्य उन वर्गों को अवसर देना है, जो सदियों से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े रहे हैं। लेकिन अब समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या आरक्षण का लाभ लगातार उन्हीं परिवारों तक सीमित होता जा रहा है, जो पहले ही सशक्त बन चुके हैं? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि यदि माता-पिता दोनों आईएएस अधिकारी हैं या उच्च सरकारी पदों पर कार्यरत हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए? अदालत की यह टिप्पणी केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक विमर्श का भी विषय है। कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि आरक्षण का उद्देश्य समाज के सबसे कमजोर तबकों को मुख्यधारा में लाना है, न कि ऐसे परिवारों को लगातार लाभ देना जो पहले ही सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके हैं। दरअसल, ओबीसी वर्ग में ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए बनाई गई थी। वर्तमान में 8 लाख रुपए वार्षिक आय से अधिक वाले परिवारों के बच्चों को ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। लेकिन बदलते समय में केवल आय ही नहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रशासनिक शक्ति भी महत्वपूर्ण कारक बन चुके हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की चिंता स्वाभाविक दिखाई देती है कि यदि आरक्षण का लाभ बार-बार संपन्न और प्रभावशाली वर्गों को मिलता रहेगा, तो वास्तविक जरूरतमंद पीछे छूट जाएंगे। हालांकि, इस विषय पर संवेदनशीलता भी जरूरी है। भारत में सामाजिक भेदभाव केवल आर्थिक स्थिति से समाप्त नहीं होता। कई बार उच्च पदों पर पहुंचने के बाद भी जातिगत पूर्वाग्रह बने रहते हैं। इसलिए आरक्षण की समीक्षा करते समय सामाजिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज आवश्यकता इस बात की है कि आरक्षण व्यवस्था को राजनीतिक बहस से ऊपर उठाकर सामाजिक न्याय और अवसर की समानता के दृष्टिकोण से देखा जाए। ‘क्रीमी लेयर’ पर सख्ती और वास्तविक वंचितों तक लाभ पहुंचाना ही आरक्षण की मूल भावना को मजबूत करेगा।
-मिलिंद ठाकरे

