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युद्ध के साये में गाजा की बकरीद,  खुशियों की जगह बेबसी और दर्द का त्योहार

गाज़ा। फिलिस्तीन की गाज़ा पट्टी में इस बार बकरीद खुशियों, रौनक और उत्सव के माहौल में नहीं, बल्कि युद्ध, तबाही, विस्थापन और गहरे आर्थिक संकट के बीच मनाई जा रही है। कभी नए कपड़ों, कुर्बानी, मिठाइयों और पारिवारिक खुशियों से भरपूर रहने वाला यह त्योहार अब लाखों परिवारों के लिए सिर्फ याद बनकर रह गया है। लगातार युद्ध,तबाही और महंगाई ने लोगों की जिंदगी को इस कदर प्रभावित किया है कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए नए कपड़े, मिठाई या एक किलो मांस तक खरीद पाने की स्थिति में नहीं हैं।

लाखों लोग टेंटों में रहने को मजबूर

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, गाजा की लगभग 80 प्रतिशत इमारतें युद्ध में क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। हजारों परिवार अब भी अस्थायी टेंटों और राहत शिविरों में जिंदगी गुजार रहे हैं। बाजारों में जरूरत का सामान बेहद सीमित मात्रा में पहुंच रहा है, क्योंकि सीमाओं पर सख्त नियंत्रण और राहत ट्रकों की सीमित एंट्री ने सप्लाई चेन को लगभग ठप कर दिया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस बार ईद सिर्फ कैलेंडर पर है, जिंदगी में नहीं। कई परिवारों ने महीनों से मांस नहीं देखा और बच्चों की ईद केवल पुराने कपड़ों और सूखी रोटियों के साथ गुजर रही है।

कुर्बानी के जानवरों की कीमतें आसमान पर

खान यूनिस समेत गाजा के कई इलाकों में इस बार कुर्बानी के लिए जानवर मिलना लगभग असंभव हो गया है। युद्ध से पहले जहां हजारों भेड़ें और बकरियां उपलब्ध थीं, अब उनकी संख्या बेहद कम बची है। स्थानीय कृषि अधिकारियों के मुताबिक एक भेड़ की कीमत युद्ध से पहले करीब 1,000 शेकेल थी, जो अब बढ़कर 11,000 से 15,000 शेकेल तक पहुंच गई है।

पशुपालन फार्म तबाह हो चुके हैं, चारे की भारी कमी है और ट्रांसपोर्ट लागत कई गुना बढ़ चुकी है। ऐसे में अधिकांश परिवार इस बार कुर्बानी करने का सपना भी नहीं देख पा रहे।

टेंटों में बन रहीं ईद की मिठाइयां

वहीं गाजा में गैस और ईंधन की कमी ने घरेलू जीवन को पूरी तरह बदल दिया है। कई परिवार मिट्टी के अस्थायी चूल्हों और ओवन में ईद की पारंपरिक मिठाइयां तैयार कर रहे हैं। खान यूनिस में विस्थापित परिवारों के वीडियो सामने आए हैं, जहां महिलाएं यूनिसेफ के तिरपाल के नीचे बैठकर मामूल और काक जैसी मिठाइयां बना रही हैं।

लोगों का कहना है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, वे अपने बच्चों के चेहरे पर थोड़ी मुस्कान लाने की कोशिश कर रहे हैं।

त्योहार नहीं, जिंदा रहने की जंग

गाजा में इस बार बकरीद सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि इंसानी संघर्ष की सबसे दर्दनाक तस्वीर बनकर सामने आई है। जहां दुनिया के कई हिस्सों में लोग ईद की तैयारियों में जुटे हैं, वहीं गाजा के लाखों परिवार भोजन, दवाइयों और सुरक्षित आश्रय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। युद्ध ने यहां लोगों से सिर्फ घर और रोजगार ही नहीं छीने, बल्कि त्योहारों की खुशियां भी छीन ली हैं।

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