भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शिक्षा और इतिहास से जुड़ा एक बड़ा विवाद चर्चा का केंद्र बन गया है। बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी की एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने विश्वविद्यालय का नाम बदलकर ‘वाग्देवी भोजपाल यूनिवर्सिटी’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब अंतिम निर्णय के लिए यह प्रस्ताव राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति मंगूभाई पटेल को भेजा गया है।
क्यों बदलना चाहते हैं यूनिवर्सिटी का नाम?
सूत्रों के मुताबिक, प्रस्ताव में दावा किया गया है कि भोपाल की ऐतिहासिक पहचान राजा भोज की विरासत से जुड़ी हुई है। इसलिए विश्वविद्यालय का नाम भी ऐसा होना चाहिए जो क्षेत्र की सांस्कृतिक, शैक्षणिक और ऐतिहासिक पहचान को प्रदर्शित करे। प्रस्ताव में राजा भोज को एक दूरदर्शी शासक, विद्वान और ज्ञान परंपरा के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिनका प्रभाव आज भी मध्य भारत की सांस्कृतिक धरोहर में दिखाई देता है।
यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा भेजे गए प्रस्ताव में राजा भोज के साहित्य, विज्ञान, वास्तुकला और शिक्षा क्षेत्र में योगदान का उल्लेख किया गया है।
प्रस्ताव में किए गए प्रमुख दावे
- राजा भोज ने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।
- उनके शासनकाल में धार शिक्षा और ज्ञान का प्रमुख केंद्र था।
- भोजशाला को प्राचीन ज्ञान और विद्या का केंद्र माना जाता है।
- भोजताल और भोजपुर जैसे ऐतिहासिक स्थल आज भी उनकी पहचान को जीवित रखते हैं।
- वाग्देवी नाम को ज्ञान और विद्या की देवी सरस्वती से जोड़कर देखा गया है।
विवाद बना राजा भोज और मौलाना बरकतउल्ला की तुलना
बता दें इस पूरे प्रस्ताव का सबसे चर्चित हिस्सा राजा भोज और मौलाना बरकतउल्ला भोपाली के योगदान की तुलना को माना जा रहा है। प्रस्ताव में यह तर्क दिया गया है कि राजा भोज की तुलना में मौलाना बरकतउल्ला का क्षेत्रीय विकास और सांस्कृतिक पहचान से प्रत्यक्ष संबंध सीमित दिखाई देता है। इसी आधार पर नाम परिवर्तन की सिफारिश की गई है। यही बिंदु अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का मुख्य कारण बन गया है।
कौन थे मौलाना बरकतउल्ला भोपाली?
मौलाना बरकतउल्ला भोपाली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन क्रांतिकारियों में शामिल थे जिन्होंने देश से बाहर रहकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ वैश्विक स्तर पर अभियान चलाया। उनका जन्म 7 जुलाई 1854 को भोपाल के इतवारा क्षेत्र में हुआ था। बाद में वे भारत की आजादी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय क्रांतिकारी नेता के रूप में पहचाने गए।
इतिहासकारों के अनुसार, 1915 में अफगानिस्तान में गठित भारत की पहली निर्वासित अंतरिम सरकार में मौलाना बरकतउल्ला प्रधानमंत्री बनाए गए थे।
उस सरकार में प्रमुख पद
- राष्ट्रपति – राजा महेंद्र प्रताप सिंह
- प्रधानमंत्री – मौलाना बरकतउल्ला
- गृह मंत्री – उबैदुल्ला सिंधी
इस सरकार का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना था।
मौलाना बरकतउल्ला केवल क्रांतिकारी ही नहीं बल्कि एक विद्वान, लेखक और बहुभाषी विचारक भी थे। वे अरबी, फारसी, अंग्रेजी और जापानी सहित कई भाषाओं के जानकार थे। उन्होंने लंदन, लिवरपूल और टोक्यो जैसे शहरों में अध्यापन कार्य किया और दुनिया के विभिन्न देशों में भारत की स्वतंत्रता का संदेश पहुंचाया। उनका संबंध गदर आंदोलन और विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारी संगठनों से भी रहा।
शिक्षा व्यवस्था में भी बड़े बदलाव की तैयारी
नाम परिवर्तन के प्रस्ताव के साथ-साथ विश्वविद्यालय में अकादमिक ढांचे में भी बदलाव की योजना बनाई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, अरबी और फारसी जैसे पारंपरिक विभागों को पुनर्गठित कर एक नए ‘तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययन विभाग’ के अंतर्गत लाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका उद्देश्य बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक अध्ययन को बढ़ावा देना बताया जा रहा है।
इतिहास, पहचान और राजनीति के बीच नई बहस
बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी के नाम परिवर्तन का मुद्दा अब केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं रह गया है। यह बहस इतिहास, सांस्कृतिक पहचान, स्वतंत्रता संग्राम की विरासत और क्षेत्रीय गौरव जैसे विषयों तक पहुंच चुकी है। अब सबकी नजर राज्यपाल के अंतिम फैसले पर टिकी है, जो तय करेगा कि भोपाल की इस प्रमुख यूनिवर्सिटी की पहचान भविष्य में किस नाम से जानी जाएगी।

