बालाघाट और कान्हा के जंगलों में बाघों की मौत से बढ़ी चिंता, साल 2026 में अब तक 15 बाघों की मौत
बालाघाट: जिले के जंगलों और कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जिस बालाघाट और कान्हा के जंगलों को बाघों का सुरक्षित आशियाना माना जाता है, वहीं लगातार हो रही मौतें वन्यजीवों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। वर्ष 2026 में अब तक के आंकड़ों के अनुसार कान्हा टाइगर रिजर्व में 11 तथा बालाघाट के सामान्य वन क्षेत्रों में चार बाघों की मौत के मामले सामने आए हैं। इस तरह दोनों क्षेत्रों को मिलाकर मौतों का आंकड़ा 15 तक पहुंच गया है।
कान्हा में संक्रमण बना काल
कान्हा टाइगर रिजर्व में अप्रैल से अक्टूबर के बीच 11 बाघों की मौत हुई। इनमें से आठ की मौत कैनाइन डिस्टेंपर वायरस संक्रमण से होने की पुष्टि हुई है। सबसे चिंताजनक घटना अप्रैल में सामने आई, जब एक बाघिन और उसके चार शावकों की कुछ ही दिनों के अंतराल में मौत हो गई। इसके बाद 19 मई और 23 जून को भी बाघों की मौत हुई। अक्टूबर में उपचाराधीन बाघिन और शावक की मौत ने संक्रमण को लेकर चिंता और बढ़ा दी। रिपोर्टों के अनुसार रिजर्व से लगे 167 गांवों में करीब तीन हजार आवारा कुत्तों का टीकाकरण भी कराया गया, लेकिन संक्रमण का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
बालाघाट में करंट का खतरा
बात सिर्फ कान्हा के जंगल की नहीं है, बालाघाट के सामान्य वन क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में बाघ पाए जाते हैं। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के रिकॉर्ड में 23 अप्रैल को उत्तर बालाघाट के जट्टा बीट, 29 जुलाई को लालबर्रा के बहियाटीकुर बीट और 29 सितंबर को दक्षिण बालाघाट के नहलेसरा बीट में बाघों की मौत दर्ज है। इसके अलावा 7 नवंबर को पूर्व बैहर सामान्य वन परिक्षेत्र की खुरमुंडी बीट में लगभग 12 वर्षीय नर बाघ का शव मिला। घटनास्थल से जीआई तार और खूंटियां बरामद हुई हैं। प्रारंभिक जांच में जंगली सूअर के शिकार के लिए बिछाए गए बिजली के तार की चपेट में आने से बाघ की मौत की आशंका जताई गई है। वन विभाग ने दो संदिग्धों को हिरासत में लिया है।
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सुरक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवाल?
बाघों की मौत का मामला सिर्फ आंकड़ों का विषय नहीं है। लगातार हो रही मौतों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जंगलों में नियमित गश्त और निगरानी कितनी प्रभावी है? क्या वन्यजीवों की आवाजाही वाले क्षेत्रों में बिजली के अवैध तारों और शिकारियों पर पर्याप्त नजर रखी जा रही है? क्या बीमारी की समय रहते पहचान और उपचार के लिए पर्याप्त चिकित्सकीय व्यवस्था उपलब्ध है? जंगल से लगे गांवों में आवारा कुत्तों और अन्य संभावित संक्रमण वाहकों की निगरानी कितनी प्रभावी है? इन सवालों ने वन विभाग और सुरक्षा प्रबंधन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब यदि बाघ अपने प्राकृतिक आवास में भी सुरक्षित नहीं है, तो उनके लिए लुटाए जाने वाले बजट को लेकर उच्च स्तरीय जांच बैठाई जानी चाहिए।

