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अगर प्रकृति हिसाब मांगने लगे, तो क्या इंसान चुका पाएगा उसका कर्ज?

भोपाल। हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व पर चर्चा होती है। लेकिन क्या कभी हमने यह सोचा है कि जिस प्रकृति से हम हर दिन अनगिनत सुविधाएं मुफ्त में प्राप्त करते हैं, अगर वह एक दिन अपना हिसाब मांगने लगे तो क्या होगा?

कल्पना कीजिए, अगर जंगल हड़ताल पर चले जाएं, पेड़ ऑक्सीजन देना बंद कर दें और नदियां अपने पानी का मीटर लगा दें, तो दुनिया कितने दिन सामान्य रूप से चल पाएगी? शायद जवाब किसी के पास नहीं होगा।

अगर हवा बेचनी पड़ जाए, तो एक सांस की कीमत कितनी होगी?

एक स्वस्थ इंसान दिनभर में हजारों लीटर हवा अपने शरीर में लेता है। यह हवा हमें पेड़ों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र से मुफ्त में मिलती है। लेकिन अगर ऑक्सीजन को भी बाजार में खरीदना पड़े, तो एक आम व्यक्ति की कमाई का बड़ा हिस्सा सिर्फ सांस लेने में ही खर्च हो सकता है।

कोविड-19 महामारी के दौरान ऑक्सीजन की कमी ने दुनिया को यह एहसास कराया था कि हवा भले दिखाई न दे, लेकिन उसकी कीमत जीवन से कम नहीं है।

अगर जंगल हड़ताल पर चले जाएं…

जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी के फेफड़े हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, वर्षा चक्र को बनाए रखते हैं, मिट्टी को बचाते हैं और लाखों जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं।

अगर जंगल एक दिन के लिए भी अपना काम बंद कर दें, तो पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने लगेगा। तापमान बढ़ेगा, जल स्रोत प्रभावित होंगे और जैव विविधता पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ लगातार वनों के संरक्षण पर जोर देते हैं।

अगर प्रकृति किराया वसूलने लगे…

धरती, पानी, हवा, जंगल, नदियां और जैव विविधता इन सभी का उपयोग इंसान सदियों से कर रहा है। विकास के नाम पर जंगल काटे गए, नदियां प्रदूषित हुईं और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया गया।

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर प्रकृति इंसानों से किराया वसूलने लगे, तो सबसे बड़ा कर्जदार कौन होगा? शायद हम सभी। क्योंकि हमने प्रकृति से बहुत कुछ लिया है, लेकिन बदले में उसे उतना लौटाया नहीं है।

पर्यावरण दिवस केवल एक दिन नहीं, जिम्मेदारी का संदेश

विश्व पर्यावरण दिवस हमें याद दिलाता है कि प्रकृति हमारे जीवन का आधार है। पेड़ लगाना, जल संरक्षण करना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना केवल विकल्प नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी जिम्मेदारी है।

प्रकृति आज भी बिना किसी शुल्क के हमें जीवन दे रही है। सवाल यह नहीं है कि प्रकृति हमें क्या दे रही है, बल्कि यह है कि हम उसे बचाने के लिए क्या कर रहे हैं।

CM मोहन ने किया ‘एक पेड़ माँ के नाम 2.0’ का शुभारंभ 

इसी कड़ी में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोपाल स्थित कुशाभाऊ ठाकरे अंतरराष्ट्रीय सभागार में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम में ‘एक पेड़ माँ के नाम 2.0’ अभियान का शुभारंभ कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इस दौरान उन्होंने पौधारोपण करते हुए प्रदेशवासियों से अपनी माँ के सम्मान में कम से कम एक पौधा लगाने की अपील की। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रकृति का संरक्षण केवल एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ा संकल्प है।

कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को सम्मानित किया गया। साथ ही 5 जून से 30 सितंबर तक पूरे प्रदेश में पौधारोपण, जल संरक्षण और हरित विकास से जुड़े विशेष कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा भी की गई। मुख्यमंत्री की यह पहल उस संदेश को और मजबूत करती है कि यदि प्रकृति हमें जीवन देने वाले अनमोल संसाधन मुफ्त में उपलब्ध करा रही है, तो उसका संरक्षण करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

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