किरनापुर/बालाघाट: जनपद पंचायत किरनापुर में पंचायतों से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों में गड़बड़ी की शिकायतों के बीच अब जांच प्रक्रिया और शिकायतकर्ताओं के साथ किए जा रहे व्यवहार पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। शिकायतकर्ता चंद्रेश मात्रे ने जांच अधिकारी भगवान सैयाम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और वरिष्ठ अधिकारियों से जवाबदेही तय करने की मांग की है।
मामला पीजी पोर्टल पर दर्ज शिकायत क्रमांक MOPRS/E/2026/0013721 से जुड़ा बताया जा रहा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि शिकायत के संबंध में बयान दर्ज कराने के लिए उन्हें जनपद पंचायत कार्यालय बुलाया गया, लेकिन वहां पहुंचने के बाद बयान दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर विवाद की स्थिति बन गई।
अब सवाल यह है? कि जब नागरिक सरकारी कार्यों में कथित अनियमितताओं की शिकायत करते हैं, तो क्या उनकी शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो रही है? क्या शिकायतकर्ता को बिना किसी असमंजस के अपनी बात रखने का अवसर मिल रहा है? और यदि जांच प्रक्रिया को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं, तो उनकी समीक्षा कौन करेगा?
शिकायतकर्ता चंद्रेश मात्रे को जाल में फंसाया
मामले को दबाने के लिए जांच अधिकारी भगवान सैयाम ने अपने पद का घोर दुरुपयोग करते हुए एक सोची-समझी साजिश रची। उन्होंने सजग नागरिक और शिकायतकर्ता चंद्रेश मात्रे को जाल में फंसाने के लिए फोन पर कहा, ‘मामला गंभीर है, तुम अकेले ही जनपद दफ्तर आ जाओ, तुम्हारा बयान दर्ज कर त्वरित कार्रवाई करेंगे।’
लेकिन असली खेल तो जनपद कार्यालय के बंद कमरों में होना था। जब शिकायतकर्ता चंद्रेश मात्रे बिना किसी पंचायत का नाम जाने, जांच के नाम पर अकेले और निहत्थे अधिकारी के चैंबर में पहुंचे, तो वहां का नजारा डराने वाला था। सूत्रों के मुताबिक, जांच अधिकारी ने बयान लिखने के बजाय शिकायतकर्ता पर ही दबाव बनाना शुरू कर दिया और उन्हें सीधे शब्दों में धमकाते हुए कहा, ‘अकेले नेतागिरी करने आ गए? जाओ, पहले सभी गवाहो को लेकर आओ, तभी बयान लिखूंगा, वरना यह शिकायत रद्दी की टोकरी में जाएगी।’
सालों से एक ही जगह जमे ‘सैयाम’
सवाल यह उठता है? कि आखिर एक ब्लॉक स्तर के अधिकारी में इतना दुस्साहस आया कहां से? चंद्रेश मात्रे और स्थानीय जागरूक नागरिकों का कहना है कि भगवान सैयाम पिछले कई सालों से इस जनपद में अंगद के पैर की तरह जमे हुए हैं। हर शिकायत की जांच की चाबी इन्हीं के पास होती है।
ग्रामीणों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा, ‘चाहे करोड़ों का घोटाला हो या सीधे-सीधे सरकारी धन का गबन, भगवान सैयाम के सामने ‘लक्ष्मी का चढ़ावा’ आते ही उनकी आंखें अंधी हो जाती हैं और आंखों पर हरी गड्डियों के कागज चिपक जाते हैं। जांच के नाम पर मिलीभगत कर मोटी रकम वसूलना और जांच रिपोर्ट में दोषियों को क्लीन चिट देकर मामले की लीपापोती करना इनका परमानेंट धंधा बन चुका है।’ यही वजह है कि आज तक किरनापुर की किसी भी भ्रष्ट पंचायत पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई, क्योंकि हर फाइल नोटों के वजन तले दबा दी जाती है।
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क्या सो रहे हैं उच्च अधिकारी? उठ रहे हैं बड़े सवाल?
इस पूरे मामले के बाद अब किरनापुर की जनता का प्रशासनिक व्यवस्था से भरोसा उठ चुका है।
- पहला सवाल: सालों से एक ही जगह जमे इस अधिकारी का तबादला अब तक क्यों नहीं हुआ?
- दूसरा सवाल: जब लिखित आदेश में पंचायत का नाम स्पष्ट ही नहीं था, तो शिकायतकर्ता को गुमराह कर अकेले जनपद पंचायत क्यों बुलाया गया? क्या उच्च अधिकारियों (सीईओ और कलेक्टर) को इस वसूली खेल की भनक नहीं है?

