नई दिल्ली: लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष सुरक्षा प्रदान करने की मांग एक बार फिर चर्चा में है। केंद्र सरकार और लद्दाख के नेताओं के बीच हुई बातचीत किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। इसके बाद पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार पर अपने वादों से पीछे हटने का आरोप लगाया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार ही अपने वादे पूरे नहीं कर रही है, तो लद्दाख के लोग आखिर अपनी बात रखने कहां जाएं।
सोनम वांगचुक ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा कि लद्दाख के लोगों को उम्मीद थी कि केंद्र के साथ बातचीत में उनकी मांगों पर कोई सकारात्मक फैसला होगा। लेकिन बैठक के बाद लोगों की उम्मीदों को झटका लगा है। उन्होंने कहा कि लद्दाख के लोग खुद को निराश और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
केंद्र सरकार पर वादे पूरे नहीं करने का आरोप
वांगचुक के अनुसार, इसी साल मई में लद्दाख के प्रतिनिधियों और केंद्रीय गृह मंत्रालय के बीच महत्वपूर्ण बातचीत हुई थी। उस दौरान लद्दाख को विशेष विधानसभा देने और प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव करने का आश्वासन दिया गया था।
उन्होंने दावा किया कि छठी अनुसूची के स्थान पर अनुच्छेद 371 के तहत विशेष सुरक्षा देने की बात पर भी चर्चा हुई थी। लद्दाख के प्रतिनिधियों ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताई थी, लेकिन अब केंद्र सरकार अपने पहले के आश्वासनों से पीछे हटती दिखाई दे रही है।
वांगचुक ने सवाल किया कि जब पहले विशेष विधानसभा और प्रशासनिक अधिकार देने की बात कही गई थी, तो अब उन प्रस्तावों पर आगे क्यों नहीं बढ़ा जा रहा है।
लद्दाख की मांगों पर क्यों नहीं बन रही सहमति?
साल 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। इसके बाद से स्थानीय संगठन पूर्ण राज्य का दर्जा, संवैधानिक सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।
लद्दाख के लोगों का कहना है कि निर्वाचित विधानसभा और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारों के बिना उनकी समस्याओं का समाधान मुश्किल है। जमीन, रोजगार, पर्यावरण और स्थानीय संस्कृति की सुरक्षा भी उनकी प्रमुख चिंताओं में शामिल है।
ताजा बातचीत में भी निर्वाचित विधानसभा की शक्तियों और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने रहने की बात सामने आई है।
चीन की टिप्पणी पर भी जताई नाराजगी
सोनम वांगचुक ने लद्दाख के मुद्दे पर चीन की ओर से की गई टिप्पणियों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि लद्दाख भारत का हिस्सा है और यहां के लोग अपने देश में ही खुश रहना चाहते हैं।
वांगचुक ने स्पष्ट किया कि लद्दाख के लोगों का विरोध अपने ही देश में संवैधानिक अधिकार हासिल करने के लिए है। उन्होंने चीन की टिप्पणी को अनुचित बताते हुए कहा कि किसी दूसरे देश को लद्दाख के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
पुराने आश्वासनों और कार्रवाई का उठाया मुद्दा
वांगचुक ने याद दिलाया कि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा को लेकर कई आश्वासन दिए गए थे। उनका आरोप है कि इन आश्वासनों को पूरा करने के बजाय स्थानीय लोगों की मांगों को लगातार नजरअंदाज किया गया।
उन्होंने सितंबर में हुए विरोध प्रदर्शनों और उसके बाद की कार्रवाई का भी जिक्र किया। वांगचुक के अनुसार, शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कदम उठाए गए। लद्दाख के लोग बातचीत से समाधान चाहते हैं, लेकिन इसके लिए केंद्र सरकार को स्पष्ट और भरोसेमंद प्रस्ताव सामने रखना होगा।
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आगे क्या होगा?
लद्दाख के प्रतिनिधियों और केंद्र सरकार के बीच बातचीत में सहमति नहीं बनने से यह मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। स्थानीय संगठनों की मांग है कि सरकार पहले किए गए आश्वासनों पर स्थिति स्पष्ट करे और संवैधानिक सुरक्षा को लेकर ठोस फैसला ले।

