लिमोज शहर में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने टाउन हॉल में आग लगा दी, जिससे 143 साल पुरानी इमारत को भारी नुकसान पहुंचा। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। आंदोलन की शुरुआत स्कूली छात्रों के विरोध से हुई थी, लेकिन अब इसमें विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों और मजदूर संगठनों की भागीदारी भी बढ़ गई है।
चार प्रमुख मांगों को लेकर आंदोलन
प्रदर्शनकारी बढ़ती महंगाई के बीच वेतन और पेंशन में वृद्धि, ईंधन की कीमतों में राहत, सरकारी सेवाओं में सुधार तथा स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने की मांग कर रहे हैं। जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत भी आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल है।
आठ दिन में 410 स्कूलों तक पहुंचा विरोध
आंदोलन की शुरुआत 21 सितंबर को पेरिस के लाइसी सेंट-एक्सूपेरी स्कूल से हुई। आर्थिक रूप से कमजोर आबादी वाले इलाके में स्थित इस स्कूल के विद्यार्थियों ने शिक्षकों और आवश्यक संसाधनों की कमी के खिलाफ प्रदर्शन किया। 29 सितंबर को प्रशासन ने अतिरिक्त कर्मचारियों की तैनाती की, जिसके बाद वहां हड़ताल समाप्त हो गई। हालांकि, तब तक विरोध दूसरे इलाकों में फैल चुका था और महज आठ दिनों में 410 स्कूल इसकी चपेट में आ गए।
पांच अक्टूबर को उत्तरी फ्रांस के लेंस शहर में प्रदर्शन के दौरान पुलिस के ग्रेनेड से 15 वर्षीय एक किशोर गंभीर रूप से घायल हो गया। उसकी बांह काटनी पड़ी। इस घटना ने पुलिस की कार्रवाई को लेकर लोगों के आक्रोश को और बढ़ा दिया।
दुकानों में तोड़फोड़, सरकार की सख्त चेतावनी
प्रदर्शन के दौरान कई शहरों में सुपरमार्केट, दवा की दुकानों, कपड़ों के शोरूम और इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकानों को निशाना बनाया गया। कुछ स्थानों पर नकाबपोश समूहों ने सुरक्षा कैमरों के संपर्क काटकर दुकानों के शीशे तोड़े और सामान लूट लिया।
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा और लूटपाट में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि सरकारी इमारतों और कारोबारी प्रतिष्ठानों पर हमले करने वालों पर मुकदमा चलाया जाएगा। बढ़ती महंगाई से शुरू हुआ यह आंदोलन अब सरकार के सामने कानून-व्यवस्था के साथ सामाजिक असंतोष की बड़ी चुनौती बन गया है।

