बालाघाट: जिले में अवैध शराब के निर्माण, परिवहन और बिक्री पर प्रभावी अंकुश लगाने की जिम्मेदारी आबकारी विभाग की है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में शराब के अवैध कारोबार को लेकर सामने आ रही शिकायतों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर गांव-गांव महिला संगठनों द्वारा नशामुक्ति अभियान चलाकर लोगों को नशे से दूर रहने का संदेश दिया जा रहा है, तो वहीं दूसरी ओर अवैध शराब की सुलभ उपलब्धता इन प्रयासों के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब अवैध शराब की सप्लाई चेन पर नियंत्रण नहीं होगा तो नशामुक्त समाज की कल्पना कैसे साकार होगी? जबकि शराब तस्करी पर नियंत्रण की जिम्मेदारी आबकारी विभाग की है, तो फिर इस समस्या से निपटने के लिए पुलिस और महिला संगठनों को लगातार सक्रिय क्यों होना पड़ रहा है?
पुलिस कर रही असली काम, आबकारी नदारद
मौजूदा समय में आबकारी विभाग की ओर से महुआ लाहन जब्त करने और कच्ची शराब नष्ट करने की कार्रवाई लगातार सामने आ रही है। नजदीकी आंकड़ों पर नजर डालें तो 09 सितंबर 2026 को आबकारी विभाग ने सावरगांव और चिखला में कार्रवाई के दौरान लगभग 1050 किलोग्राम महुआ लाहन तथा 95 लीटर हाथभट्टी शराब बरामद की, जिसकी कीमत 1.20 लाख रुपये थी। वारासिवनी के जोधीटोला, पायली में 690 किलो लाहन और 22 लीटर शराब जब्त की। वहीं 24 अक्टूबर को मोहझारी में 81 हजार रुपये कीमत की 800 किलो महुआ लाहन और 10 लीटर शराब जब्त की गई।
कार्रवाई से जुड़े ये आंकड़े बताते हैं कि आबकारी विभाग द्वारा सिर्फ जिले में अवैध शराब बनाने की गतिविधियों पर फोकस किया जा रहा है, लेकिन जिले में जिस तरह देशी-विदेशी मदिरा की सप्लाई हो रही है, उससे आबकारी विभाग को मानो कोई सरोकार ही नहीं है। यूं कहें कि महुआ लाहन और कच्ची शराब जब्त करके अपनी पीठ थपथपाने वाला आबकारी विभाग अपना असली दायित्व भूल चुका है, जिसके चलते जिले में अंतरराज्यीय स्तर से शराब की तस्करी हो रही है।
अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई करने में पुलिस की भूमिका भी महत्वपूर्ण है और इन मामलों में पुलिस की कार्रवाई तारीफ के काबिल भी है। बीती कुछ कार्रवाइयों में पुलिस की सक्रियता नजर आई, जहां पुलिस ने लांजी क्षेत्र में 02 बड़ी कार्रवाई की और लगभग 5 लाख रुपये की शराब पकड़ी। जिससे स्पष्ट है कि पुलिस कमोबेश अपना दायित्व निभा लेती है।
लेकिन नशे के कारोबार की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का मुद्दा भी है। यदि बल की कमियों के बीच पुलिस को अवैध शराब की बिक्री रोकने के लिए भी लगातार कार्रवाई करनी पड़ रही है, तो आबकारी विभाग की जिम्मेदारियों और मैदानी निगरानी की समीक्षा पर प्रश्न उठना लाजमी है।
उठ रहे हैं 3 बड़े सवाल ?
आबकारी विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जिले में अवैध शराब की बिक्री रोकने के लिए उनके अपने कितने दल सक्रिय हैं, उनके द्वारा कितने स्थायी निगरानी अभियान चलाए जा रहे हैं और कितने मामलों में शराब के वास्तविक आपूर्तिकर्ताओं तक पहुंचकर कार्रवाई की गई है।
गांव-गांव चलाए जा रहे नशामुक्ति अभियानों का उद्देश्य लोगों को शराब और अन्य नशीले पदार्थों से दूर करना है। लेकिन आबकारी विभाग की निष्क्रियता के चलते यदि ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध शराब आसानी से उपलब्ध होगी तो ऐसे अभियान बीच में ही दम तोड़ देंगे।
बालाघाट जिले में अवैध शराब के कारोबार पर नियंत्रण के लिए आबकारी विभाग और पुलिस के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है। लेकिन समन्वय के नाम पर किसी विभाग की मूल जिम्मेदारी कम नहीं होनी चाहिए। आबकारी विभाग को अवैध शराब तस्करी पर रोक लगाने की ओर फोकस करना चाहिए और पहला कदम बढ़ाना चाहिए, अन्यथा पुलिस पर कार्रवाई का बोझ बढ़ता रहेगा और आबकारी विभाग मजे काटता रहेगा।
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