नई दिल्ली। देश में हो रही रसोई गैस की किल्लत को कम करने के लिए केंद्र सरकार अब अकेले खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं रहेगी। एलपीजी की आपूर्ति व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए नए अंतरराष्ट्रीय स्रोतों की ओर रुख किया है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश का कुल गैस आयात घटा जरूर है, लेकिन आपूर्ति स्रोतों का दायरा बढ़ाया है।
ईरान-इजराईल युद्ध के बाद बने हालातों ने होर्मुज में गैस आयात की स्थिति को बदल दिया है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, बीते एक सप्ताह में कुल आयात घटकर 2 लाख 65 हजार टन रह गया, जबकि इससे पहले यह 3 लाख 22 हजार टन था। विशेष रूप से पश्चिम एशिया युद्धप्रभावित देशों से आने वाली आपूर्ति में कमी दर्ज की गई है, जो अब 89 हजार टन तक सीमित हो गई है।
वहीं इसके उलट, अमेरिका से आयात में असमान्य वृद्धि दर्ज की गई है। खाड़ी देशों के अलावा अन्य देशों से कुल 1 लाख 76 हजार टन गैस आयात की गई, जिसमें बड़ा हिस्सा अमेरिका का रहा। तेल विपणन कंपनियां अब रूस और जापान जैसे देशों से भी गैस आयात की संभावनाएं तलाश रही हैं।
जानकारी मानते हैं कि यह रणनीति देश में गैस आपूर्ति जोखिम को कम करने के उद्देश्य से अपनाई गई है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील मार्गों पर निर्भरता कम करना और वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करना ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी हैं। हालांकि, अलग-अलग देशों से आने वाले गैस टैंकरों को भारत पहुंचने में अलग-अलग समय लगता है। खाड़ी देशों से गैस 7 से 8 दिन में पहुंचती है, जबकि अमेरिका से 45 दिन तक का समय लग सकता है। यह बदलाव संकेत देता है कि भारत अब ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए दीर्घकालिक और संतुलित नीति की ओर बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में किसी भी आपूर्ति संकट का प्रभाव कम किया जा सके।
एलपीजी आयात की भारत सरकार ने बदली रणनीति, नए ठिकाने तलाशकर खाड़ी देशों से घटाई निर्भरता
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