मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की तैयारी केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को नए सिरे से गढ़ने की पहल है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के संकेत के बाद राज्य सरकार ने इस दिशा में कदम तेज कर दिए हैं। यदि यह कानून लागू होता है, तो शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में सभी धर्मों के लिए एक समान नियम लागू होंगे, जो ‘एक राष्ट्र, एक कानून’ की अवधारणा को मजबूत करेंगे। यूसीसी का सबसे बड़ा उद्देश्य समानता स्थापित करना है। वर्तमान में अलग-अलग धर्मों के अपने ‘पर्सनल ला’ हैं, जिनमें कई बार महिलाओं और कमजोर वर्गों के अधिकार सीमित हो जाते हैं। यूसीसी के लागू होने से बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिलेगा और बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगेगा। यह सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। हालांकि, यह राह आसान नहीं है। मध्यप्रदेश की सामाजिक बनावट विविधताओं से भरी है, खासकर जनजातीय समुदायों की परंपराएं इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती बन सकती हैं। ऐसे में यूसीसी लागू करते समय इन परंपराओं को नजरअंदाज करना सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकता है। अन्य राज्यों के अनुभव भी महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। उत्तराखंड ने जहां यूसीसी लागू कर एक मॉडल प्रस्तुत किया है, वहीं गुजरात और असम ने अपने-अपने तरीके से कदम बढ़ाए हैं। खास बात यह है कि इन राज्यों में जनजातीय समुदायों को कानून से बाहर रखा गया है, जिससे एक संतुलन बनाने की कोशिश दिखती है। मप्र के सामने भी यही कसौटी है-समानता और सांस्कृतिक विविधता के बीच संतुलन बनाना। यदि सरकार संवाद, संवेदनशीलता और व्यापक सहमति के साथ आगे बढ़ती है, तो यूसीसी सामाजिक सुधार का मजबूत आधार बन सकता है। अन्यथा, यह एक विवादास्पद मुद्दा बनकर सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर सकता है।
-मिलिंद ठाकरे

