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महिला आरक्षण बिल : मोदी के माफीनामा के मायने ?

देश की राजनीति में महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में है। नरेंद्र मोदी द्वारा महिला आरक्षण बिल पास न होने पर सार्वजनिक माफी मांगना अपने आप में एक असामान्य और भावनात्मक राजनीतिक कदम है। लेकिन इसके साथ ही विपक्ष पर उनका तीखा हमला इस पूरे मुद्दे को केवल संवेदनशील सामाजिक विषय से आगे बढ़ाकर एक बड़े सियासी टकराव में बदल देता है।
प्रधानमंत्री ने जिस तरह ‘नारी शक्ति’ के अधिकार छिनने की बात कही, वह सीधे-सीधे जनता, खासकर महिला मतदाताओं से संवाद स्थापित करने की कोशिश है। उनका यह बयान कि विपक्ष ने महिलाओं के सपनों को कुचल दिया, राजनीतिक संदेश से ज्यादा भावनात्मक अपील नजर आता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस मुद्दे को केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर देना उचित है? वास्तविकता यह है कि महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विधेयक का पास न होना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर संकेत है। 298 वोट समर्थन में और 230 विरोध में होने के बावजूद आवश्यक बहुमत का अभाव यह दिखाता है कि राजनीतिक सहमति अभी भी दूर है। यह केवल सरकार या विपक्ष की विफलता नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र की सामूहिक कमी को दर्शाता है।प्रधानमंत्री का यह आरोप कि कुछ दल ‘पार्टी हित’ को देशहित से ऊपर रखते हैं, एक बड़ा राजनीतिक बयान है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सरकार यह स्पष्ट करे कि इतने अहम बिल के लिए पर्याप्त समर्थन सुनिश्चित क्यों नहीं किया जा सका। लोकतंत्र में केवल नैतिक अपील नहीं, बल्कि रणनीतिक सहमति भी जरूरी होती है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या महिला आरक्षण वास्तव में प्राथमिकता है या यह भी एक चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगा? देश की आधी आबादी अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होगी। उन्हें ठोस परिणाम चाहिए। नारी सम्मान पर राजनीति आसान है, लेकिन उसे वास्तविक अधिकारों में बदलना ही असली परीक्षा है।

-मिलिंद ठाकरे

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