Saturday, November 7, 2026
Contact: +91 97559 93555
Email: tathyawani@gmail.com
spot_img
Hometrending newsकान खिंचे तो बदले प्रीतम लोधी के स्वर!

कान खिंचे तो बदले प्रीतम लोधी के स्वर!

प्रीतम सिंह लोधी के हालिया बयान और फिर उसके बाद आया उनका नरम रुख, भारतीय राजनीति में जिम्मेदारी और संयम की अहमियत को एक बार फिर उजागर करता है। सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों के शब्द केवल व्यक्तिगत नहीं होते, बल्कि वे पूरे तंत्र और समाज पर असर डालते हैं। आईपीएस अधिकारी को लेकर दिए गए विवादित बयान के बाद जिस तरह से मामला तूल पकड़ता गया, उसने यह साफ कर दिया कि आज के दौर में सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा कितनी महत्वपूर्ण है। आखिरकार जब लोधी सीएम हाउस पहुंचे और मोहन यादव व प्रदेश अध्यक्ष के सामने खेद जताया, तो यह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि एक जरूरी राजनीतिक संकेत भी था। लोधी का यह स्वीकार करना कि शब्दों का चयन गलत हो गया, इस बात की ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं उन्हें अपनी सीमा का अहसास हुआ है। हालांकि, उन्होंने अपने बेटे के जुलूस निकाले जाने को लेकर भावनात्मक आहत होने की बात भी कही, जो मानवीय दृष्टि से समझी जा सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनप्रतिनिधियों को निजी भावनाओं के प्रभाव में आकर सार्वजनिक पद की गरिमा से समझौता करना चाहिए? राजनीति में संवाद का स्तर गिरना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर घटना एक अवसर भी होती है, सुधार का, सीखने का। लोधी का बदला हुआ रुख पार्टी अनुशासन और नेतृत्व के प्रभाव को भी दर्शाता है। यह स्पष्ट संदेश है कि संगठन के भीतर भी जवाबदेही तय होती है और कोई भी नेता उससे ऊपर नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा सबक निकलता है कि सत्ता के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। शब्दों की ताकत को समझना और उनका संतुलित उपयोग करना ही एक सच्चे जनप्रतिनिधि की पहचान है। यदि यह समझ स्थायी बन जाए, तो राजनीति में संवाद का स्तर निश्चित रूप से बेहतर हो सकता है।

-मिलिंद ठाकरे

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

ई-पेपर

1 to 7 November 2026
25 to 31 October 2026

शासकीय निविदाएं

विज्ञापन