मप्र के 1895 स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं है। स्कूल शिक्षा व्यवस्था पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट ने एक गंभीर सच्चाई उजागर की है। समस्या केवल शिक्षकों की कमी नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की व्यवस्थागत विफलता है। वर्षों से भर्ती को ही समाधान माना जाता रहा, जबकि वास्तविक चुनौती मानव संसाधन प्रबंधन, प्रशिक्षण और जवाबदेही की रही है। रिपोर्ट बताती है कि जहां जरूरत है वहां शिक्षक नहीं हैं, और जहां छात्र ही नहीं, वहां शिक्षक तैनात हैं। यह असंतुलन केवल लापरवाही नहीं, बल्कि नीति और क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई का परिणाम है। पदों का युक्तिकरण वर्षों तक नहीं हुआ, ट्रांसफर-पोस्टिंग में पारदर्शिता का अभाव रहा और विषयवार शिक्षकों की तैनाती सुनिश्चित नहीं की गई। सबसे चिंताजनक पहलू शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की स्थिति है। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) में ही बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं, जिससे शिक्षकों के कौशल विकास पर सीधा असर पड़ा है। जब प्रशिक्षक ही नहीं होंगे, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यही कारण है कि स्वीकृत प्रशिक्षण कार्यक्रम भी पूरे नहीं हो पाए और आवंटित बजट का बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों की अनदेखी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां बिना शिक्षक के कक्षाएं चल रही हैं। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का भविष्य है जो बुनियादी शिक्षा से वंचित हो रही है। इसका असर बोर्ड परिणामों से लेकर बच्चों की मूलभूत सीखने की क्षमता तक साफ दिखाई दे रहा है। डिजिटल सिस्टम की विफलता और निरीक्षण की कमी ने समस्या को और जटिल बना दिया है। जब मॉनिटरिंग ही कमजोर हो और शिकायतें वर्षों तक लंबित रहें, तो सुधार की उम्मीद बेमानी हो जाती है। स्पष्ट है कि केवल नई भर्तियां इस संकट का समाधान नहीं हैं। जरूरत है एक पारदर्शी, जवाबदेह और संतुलित शिक्षा तंत्र की, जिसमें सही शिक्षक सही स्थान पर हों, नियमित प्रशिक्षण हो और सख्त निगरानी सुनिश्चित की जाए। जब तक यह बदलाव नहीं होगा, तब तक सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता सुधार एक अधूरा सपना ही बना रहेगा।
-मिलिंद ठाकरे

