मप्र विधानसभा के विशेष सत्र में ‘नारी शक्ति वंदन’ को लेकर हुआ घटनाक्रम यह दर्शाता है कि महिला आरक्षण का मुद्दा आज भी राजनीतिक सहमति से अधिक टकराव का विषय बना हुआ है। एक ओर सरकार इसे ऐतिहासिक पहल बताकर अपनी प्रतिबद्धता जता रही है, वहीं विपक्ष इसकी समयसीमा और क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है। ऐसे में यह बहस केवल एक संकल्प तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि लोकतंत्र में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी पर केंद्रित हो जाती है। सदन में पारित संकल्प निस्संदेह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन जिस तरह संशोधन प्रस्ताव पर मतदान की मांग को लेकर विवाद हुआ और अंततः विपक्ष ने वॉकआउट किया, वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन उसका समाधान संवाद और स्पष्ट प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि टकराव और बहिष्कार से। सरकार का यह तर्क सही है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया और परिसीमन आवश्यक है। लेकिन विपक्ष का यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यदि नीयत स्पष्ट है तो इसकी समयसीमा और रोडमैप स्पष्ट क्यों नहीं ? महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का वादा तभी सार्थक होगा, जब वह ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना के साथ सामने आए। वास्तविकता यह है कि महिला सशक्तिकरण केवल योजनाओं और घोषणाओं से आगे की चीज है। स्थानीय निकायों में आरक्षण या सरकारी योजनाएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन राजनीतिक निर्णय लेने वाले मंचों-विधानसभा और संसद में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी ही सच्चे सशक्तिकरण का पैमाना होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू से ऊपर उठाकर देखा जाए। यह मुद्दा किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे समाज के संतुलित और समावेशी विकास से जुड़ा है। और ‘नारी शक्ति वंदन’ का वास्तविक अर्थ तभी साकार होगा, जब यह केवल संकल्प पत्रों और भाषणों तक सीमित न रहकर धरातल पर प्रभावी रूप से लागू हो। महिलाओं को अधिकार देने की बात अब प्रतीक्षा नहीं, बल्कि प्राथमिकता बननी चाहिए।
-मिलिंद ठाकरे

