माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में नवागत विद्यार्थियों के प्रबोधन कार्यक्रम की वक्ता सूची को लेकर उठे सवाल महज किसी एक वर्ग की अनुपस्थिति का मामला नहीं हैं। इसके केंद्र में एक व्यापक प्रश्न है-क्या पत्रकारिता का शिक्षण देने वाला संस्थान अपने मंच पर समाज की विविधता को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दे रहा है?
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज से वक्ताओं की मौजूदगी को लेकर कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के वातावरण पर एक खास विचारधारा के प्रभाव का आरोप भी लगाया है। यह आरोप राजनीतिक बहस का विषय हो सकता है, लेकिन प्रतिनिधित्व के मूल सवाल को केवल राजनीतिक बयान कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य ही समाज के हर वर्ग की आवाज को सामने लाना है। ऐसे में पत्रकारिता के विद्यार्थियों को समाज को केवल सत्ता, संस्थानों और प्रभावशाली वर्गों के नजरिए से नहीं, बल्कि उन समुदायों के अनुभवों से भी समझना चाहिए, जिनकी आवाज अक्सर मुख्यधारा में अपेक्षाकृत कम सुनाई देती है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और अन्य वंचित समुदायों से आने वाले पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता विद्यार्थियों को समाज की एक अलग और जरूरी तस्वीर दे सकते हैं।
बेशक, किसी वक्ता का चयन केवल उसकी जातीय पहचान के आधार पर नहीं होना चाहिए। योग्यता, विषय की विशेषज्ञता और अनुभव ही प्रमुख कसौटियां होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि संस्थान की चयन प्रक्रिया समाज के अलग-अलग वर्गों में मौजूद योग्य और प्रतिभाशाली लोगों तक पहुंचे। प्रतिनिधित्व का अर्थ योग्यता से समझौता करना नहीं, बल्कि योग्य प्रतिभाओं के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना है। इस पूरे विवाद पर विश्वविद्यालय प्रबंधन को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय पारदर्शिता के जरिए स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि वक्ताओं के चयन की कोई स्पष्ट प्रक्रिया और निर्धारित मापदंड हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। साथ ही भविष्य के कार्यक्रमों में सामाजिक विविधता और व्यापक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखना चाहिए।
सामाजिक न्याय किसी एक राजनीतिक दल की विचारधारा या एजेंडा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी भावना है। पत्रकारिता संस्थान इस भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि मंच पर कौन-सी विचारधारा के लोग मौजूद थे, बल्कि यह है कि क्या उस मंच पर समाज की जरूरी और विविध आवाजों के लिए पर्याप्त जगह थी? यही सवाल किसी भी पत्रकारिता संस्थान की लोकतांत्रिक सोच, सामाजिक संवेदनशीलता और समावेशी दृष्टिकोण की असली परीक्षा है।
-मिलिंद ठाकरे

