नई दिल्ली। सरकार ने 2026-27 के लिए अपने खजाने का पिटारा खोल दिया है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि सरकार की कमाई कम है और खर्च बहुत ज्यादा। तो आखिर 35 लाख करोड़ रुपये की कमाई में 53 लाख करोड़ का खर्च कैसे चलेगा? आइए समझते हैं सरकारी बही-खाते का आसान गणित। सरकारी तिजोरीः कहां से आएगा पैसा?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट दस्तावेजों के अनुसार, आगामी वित्तीय वर्ष में केंद्र सरकार की कुल कमाई लगभग 35.33 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कर राजस्व का है। हालांकि, कुल टैक्स वसूली 44 लाख करोड़ होगी, लेकिन इसमें से करीब 15 लाख करोड़ रुपये राज्यों को उनके हिस्से के रूप में दे दिए जाएंगे। केंद्र के पास जो पैसा बचेगा, उसमें बड़ा योगदान आम आदमी द्वारा दिए गए आयकर और वस्तु एवं सेवा कर का होगा। इसके अलावा, सरकारी कंपनियों के लाभांश और ब्याज से होने वाली कमाई भी इसमें शामिल है।
उधारी के सहारे विकास की गाड़ी
अब सवाल यह है कि जब जेब में 35 लाख करोड़ हैं, तो सरकार 53.47 लाख करोड़ रुपये खर्च कैसे करेगी? इसका जवाब है- भारी-भरकम कर्ज। सरकार ने साफ किया है कि इस अंतर को पाटने के लिए वह करीब 16.95 लाख करोड़ रुपये उधार लेगी। सरल शब्दों में कहें तो सरकार जो एक रुपया खर्च करेगी, उसमें से करीब 24 पैसे उधारी के होंगे। यह कर्ज घरेलू बाजार (जैसे सरकारी बॉन्ड) और कुछ हिस्सा विदेशी स्रोतों से लिया जाएगा। पिछले साल के मुकाबले उधारी में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है, जो चिंता का विषय हो सकता है, लेकिन विकास कार्यों को जारी रखने के लिए सरकार इसे जरूरी मान रही है।
घाटा कम करने की चुनौती
सरकार अपनी कमाई से ज्यादा खर्च कर रही है, इसे आर्थिक भाषा में राजकोषीय घाटा कहते हैं। 2026-27 के लिए सरकार ने इसे सकल घरेलू उत्पाद के 4.3 फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। अच्छी बात यह है कि सरकार के पास कर्ज को कम करने का एक रोडमैप भी है। लक्ष्य है कि 2030 तक देश पर कुल कर्ज को जीडीपी के 50 फीसदी तक लाया जाए। फिलहाल, यह बजट तीन स्तंभों पर टिका है, स्थिर टैक्स कमाई, बाजार से बड़ी उधारी और भविष्य में कर्ज के बोझ को कम करने का वादा।
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