ईरान-अमेरिका युद्धः सीनेट में युद्ध शक्ति प्रस्ताव खारिज, राष्ट्रपति ट्रंप को मिली सैन्य कार्रवाई की खुली छूट

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वाशिंगटन। मध्य-पूर्व में जारी भीषण संघर्ष के बीच अमेरिकी राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी सीनेट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाले वॉर पावर्स रेजोल्यूशन को भारी बहुमत से नामंजूर कर दिया है। इस फैसले के बाद अब राष्ट्रपति को ईरान के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाने के लिए अमेरिकी कांग्रेस (संसद) की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी।
भारी वित्तीय बोझ के बावजूद युद्ध जारी रखने का संकेत
युद्ध के छठे दिन तक के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका को यह सैन्य अभियान अत्यधिक महंगा साबित हो रहा है। जहां ईरान कम लागत वाले ड्रोन (मानवरहित विमानों) के जरिए अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है, वहीं अमेरिका को इन्हें इंटरसेप्ट (रास्ते में ही नष्ट) करने के लिए अत्यधिक महंगी मिसाइलों का उपयोग करना पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले छह दिनों में ही अमेरिका लगभग 60 हजार करोड़ डॉलर की राशि खर्च कर चुका है। ईरान की सैन्य शक्ति का आकलन करने में भी अमेरिका से चूक होती दिख रही है; ईरानी प्रतिरोध उम्मीद से कहीं अधिक सुदृढ़ और रणनीतिक साबित हुआ है।
सदन में दलीय आधार पर हुआ मतदान
अमेरिकी संसद में इस प्रस्ताव पर हुई वोटिंग (मतदान) में रिपब्लिकन सांसद राष्ट्रपति ट्रंप के साथ मजबूती से खड़े नजर आए। यह प्रस्ताव 47 के मुकाबले 53 मतों से गिर गया।
समर्थनः केंटकी के रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।
विरोधः पेंसिल्वेनिया के डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव के विरुद्ध (ट्रंप के समर्थन में) वोट दिया।
राजनेताओं के बीच तीखी बहस
डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने इस फैसले पर चिंता जताते हुए कहा कि यह वोट तय करेगा कि सांसद अंतहीन युद्धों से थकी हुई जनता के साथ हैं या सत्ता के साथ। दूसरी ओर, रिपब्लिकन नेता जॉन बरासो ने तर्क दिया कि असली प्राथमिकता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को ध्वस्त करना है, न कि राष्ट्रपति के हाथ बांधना।
युद्ध के लंबा खिंचने के आसार
रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के अनुसार, यह संघर्ष आठ सप्ताह या उससे अधिक समय तक चल सकता है। ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ (संयुक्त सेना प्रमुख) के अध्यक्ष जनरल डैन केन ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी सैनिकों पर खतरा बरकरार है। हाल ही में कुवैत में हुए एक ड्रोन हमले में 6 अमेरिकी सैनिकों की मृत्यु ने इस जोखिम को और स्पष्ट कर दिया है।

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