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Homeमध्य प्रदेश"महात्मा गांधी मजबूरी नहीं, मजबूती का नाम हैं”

“महात्मा गांधी मजबूरी नहीं, मजबूती का नाम हैं”

✍️ नीरज तिवारी (शिक्षाविद, राजनीतिक विश्लेषक एवं सामाजिक विचारक)

भोपाल, महात्मा गांधी का नाम किसी योजना की मजबूरी नहीं, बल्कि भारत की वैचारिक मजबूती का प्रतीक है, और इसी दृष्टि से देखें तो विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल ( VB-G RAM G) 2025 के तहत महात्मा गांधी के नाम को हटाया जाना केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक संदेश का संकेत देता है, क्योंकि महात्मा गांधी का नाम उस स्थिति में लिया जाना चाहिए जहाँ वह आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन, नैतिक साहस और सामाजिक परिवर्तन की चेतना का प्रतिनिधित्व करे, न कि उस मजबूरी का प्रतीक बने जहाँ राज्य को हर वर्ष करोड़ों नागरिकों को न्यूनतम मजदूरी देकर जीवित रखना पड़े; मनरेगा, जो 2005 में यूपीए सरकार द्वारा लाया गया, अपने समय में ग्रामीण भारत के लिए एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप था और इसके तहत पिछले 19 वर्षों में औसतन हर साल 5 से 6 करोड़ परिवारों को काम मिला, 2020-21 जैसे महामारी वर्ष में यह संख्या 11 करोड़ से अधिक तक पहुँची और उस वर्ष सरकार ने लगभग 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि 2006-07 में यह बजट केवल 11,300 करोड़ रुपये था, जो दर्शाता है कि यह योजना धीरे-धीरे गरीबी उन्मूलन के साधन से गरीबी प्रबंधन के ढांचे में बदलती चली गई।

सवाल यह नहीं है कि मनरेगा ने मदद की या नहीं — उसने की, बल्कि सवाल यह है कि क्या 20 साल बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था ऐसी ही आपातकालीन रोजगार नीति पर निर्भर रहनी चाहिए और क्या महात्मा गांधी का नाम उस निरंतर निर्भरता का प्रतीक बना रहना चाहिए, क्योंकि गांधी का विचार ‘काम दो’ नहीं बल्कि ‘काम पैदा करो’ था, वे ग्राम स्वराज, स्थानीय उद्योग, कुटीर उत्पादन, आत्मनिर्भर गांव और राज्य पर न्यूनतम निर्भरता के पक्षधर थे, जबकि मनरेगा का ढांचा राज्य-निर्भर मजदूरी व्यवस्था को स्थायी बनाता गया; आंकड़े बताते हैं कि आज भी मनरेगा के तहत औसत मजदूरी 230–260 रुपये प्रतिदिन के बीच है, जो कई राज्यों में न्यूनतम कृषि मजदूरी से कम है, और भुगतान में औसतन 20 से 45 दिन की देरी सामान्य बात है, जिसके कारण सर्वोच्च न्यायालय और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) कई बार सरकारों को फटकार लगा चुके हैं, ऐसे में गांधी के नाम को एक ऐसी व्यवस्था से जोड़ना जहाँ श्रमिक को समय पर मेहनताना भी न मिले, स्वयं गांधीवादी मूल्यों के विपरीत प्रतीत होता है; विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल, 2025 सरकार की उस कोशिश को दर्शाता है जिसमें वह यह संकेत देना चाहती है कि भारत अब केवल ‘रोजगार गारंटी’ के सहारे नहीं, बल्कि कौशल, डिजिटल ट्रैकिंग, परिसंपत्ति निर्माण और स्थानीय आजीविका मॉडल के माध्यम से आगे बढ़ना चाहता है, और इसी संदर्भ में गांधी का नाम हटाकर ‘विकसित भारत’ की अवधारणा को सामने रखना सरकार की वैचारिक प्राथमिकता को दर्शाता है; आलोचक इसे गांधी का अपमान कहते हैं, लेकिन यह तर्क अधूरा है, क्योंकि सम्मान नाम जोड़ने से नहीं, विचार को जीवित रखने से होता है, और अगर कोई योजना 20 वर्षों तक चलने के बाद भी स्थायी रोजगार, उत्पादक परिसंपत्तियाँ और ग्रामीण पलायन में ठोस कमी नहीं ला पाई, तो उस पर पुनर्विचार करना न तो गांधी विरोध है और न ही गरीब विरोध, बल्कि नीति की परिपक्वता का संकेत है; सरकार का दावा है कि नए बिल के तहत काम के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 किया जाएगा, डिजिटल निगरानी से फर्जी जॉब कार्ड और लीकेज रोके जाएंगे, कौशल उन्नयन से श्रमिकों को दीर्घकालिक आय के अवसर मिलेंगे और परिसंपत्ति निर्माण को प्राथमिकता दी जाएगी, जबकि विपक्ष का आरोप है कि बजट,मजदूरी दर और मांग आधारित गारंटी कमजोर की जा रही है।

लेकिन यहां एक राजनीतिक विश्लेषक के रूप में यह समझना जरूरी है कि यह टकराव असल में दो विचारधाराओं का है एक वह जो राज्य को स्थायी रोजगार प्रदाता मानती है और दूसरी वह जो राज्य को सक्षमकर्ता की भूमिका में देखती है; 2024 के बाद की राजनीति में सरकार यह संकेत देना चाहती है कि भारत को ‘मजबूरी की योजनाओं’ से बाहर निकालकर ‘मजबूती की नीतियों’ की ओर ले जाना होगा, और इसी क्रम में महात्मा गांधी के नाम को उस संदर्भ से मुक्त करना चाहती है जहाँ वह गरीबी, बेरोजगारी और अस्थायी मजदूरी से जुड़ता हो, क्योंकि गांधी का नाम दया नहीं, दृढ़ता का प्रतीक है; यह भी तथ्य है कि मनरेगा के तहत बनी परिसंपत्तियों का एक बड़ा हिस्सा टिकाऊ नहीं रहा, कई रिपोर्ट्स के अनुसार 30–40 प्रतिशत परिसंपत्तियाँ कुछ वर्षों में अनुपयोगी हो गईं, जिससे यह प्रश्न उठता है कि क्या यह योजना आर्थिक रूप से उत्पादक निवेश थी या केवल उपभोग आधारित राहत और यदि राहत स्थायी बन जाए तो वह विकास में बाधा बन जाती है,इस पूरे विमर्श में यह स्वीकार करना होगा कि गरीबों को सहारा देना राज्य का दायित्व है, लेकिन उन्हें हमेशा सहारे पर रखना राज्य की असफलता का संकेत भी होता है, और शायद यही वह बिंदु है जहाँ सरकार यह कहना चाहती है कि गांधी का नाम सहारे का नहीं,स्वावलंबन का प्रतीक है; इसलिए इस कानून से महात्मा गांधी का नाम हटाया जाना यदि भावनाओं से हटकर देखा जाए तो इसे अपमान नहीं, बल्कि वैचारिक पुनर्स्थापन के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, जहाँ गांधी को मजबूरी की राजनीति से निकालकर मजबूती के राष्ट्र-निर्माण के विचार में पुनः स्थापित करने का प्रयास है, और यही कारण है कि यह बिल केवल रोजगार कानून नहीं,बल्कि भारत की सामाजिक-आर्थिक सोच में हो रहे परिवर्तन का दस्तावेज़ बन जाता है…

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