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पाकिस्तान–अफगानिस्तान टकराव: क्या यह सीमाई झड़प है या बड़े युद्ध की आहट?

दक्षिण एशिया एक बार फिर अस्थिरता की ओर बढ़ता दिख रहा है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच ताजा सैन्य कार्रवाई ने पुराने जख्मों को फिर हरा कर दिया है। दोनों देशों की सेनाओं के बीच हवाई हमले और सीमा चौकियों पर जवाबी कार्रवाई ने हालात को बेहद तनावपूर्ण बना दिया है। सवाल यह है कि यह टकराव अचानक नहीं है, इस संघर्ष की जड़ें इतिहास में बहुत गहराई तक धंसी हुई हैं।

तनाव की नई परत

जानकारी के मुताबिक पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के काबुल, कंधार और पक्तिका क्षेत्रों में हवाई हमले किए, जिन्हें ‘ऑपरेशन गजब-लिल-हक’ नाम दिया गया। इस कार्रवाई में बड़ी संख्या में तालिबान लड़ाकों के मारे जाने का दावा किया गया है।

वहीं अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान ने भी पाकिस्तान की सीमा चौकियों को निशाना बनाया और जवाबी हमले किए। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए खुले संघर्ष की चेतावनी दी। इस ताजा सैन्य गतिविधि ने दोनों देशों को संभावित बड़े संघर्ष के मुहाने पर ला खड़ा किया है।

1893 की डूरंड रेखा:

दरअसल विवाद की असली जड़ पाकिस्तान–अफगानिस्तान संबंधों की सबसे बड़ी ऐतिहासिक गांठ डूरंड लाइन है। जो 12 नवंबर 1893 को ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर मोर्टिमर डूरंड और अफगान अमीर अब्दुल रहमान खान के बीच समझौते के तहत 2,640 किलोमीटर लंबी यह सीमा रेखा खींची गई थी।

जिसे अफगानिस्तान ने आज तक इस रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में पूरी तरह स्वीकार नहीं करता। उसका तर्क है कि यह रेखा पश्तून और बलूच समुदायों को कृत्रिम रूप से दो हिस्सों में बांटती है। पाकिस्तान ने 2017 में इस पूरी सीमा पर बाड़ लगानी शुरू की, जिसका तालिबान सरकार ने सत्ता में आने के बाद विरोध किया। जो तोरखम और चमन जैसे बॉर्डर पॉइंट अक्सर सैन्य तनातनी के केंद्र बन जाते हैं।

तहरीक-ए-तालिबान: संघर्ष का समकालीन कारण

बता दें सीमाई विवाद के अलावा वर्तमान तनाव का बड़ा कारण तहरीक-ए-तालिबान यानी टीटीपी है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल टीटीपी के लड़ाके पाकिस्तान में हमलों के लिए कर रहे हैं। 2001 के बाद जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में ‘वॉर ऑन टेरर’ शुरू किया, तो कई उग्रवादी समूह सीमावर्ती इलाकों में शरण लेने लगे। 2007 में टीटीपी का औपचारिक गठन हुआ और उसने पाकिस्तानी राज्य के खिलाफ हिंसक अभियान शुरू किया। यह सीमा पार आतंकवाद दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई को और चौड़ा करता रहा है।

FATA से बदलता भू-राजनीतिक समीकरण

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान के पूर्व संघीय प्रशासित कबायली क्षेत्र (FATA) लंबे समय तक एक बफर जोन की तरह काम करते रहे। ब्रिटिश काल में लागू ‘फ्रंटियर क्राइम्स रेगुलेशन’ के तहत यहां अलग प्रशासनिक ढांचा था।

वहीं 2018 में FATA को खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में विलय कर दिया गया। इसके बाद वह बफर स्पेस खत्म हो गया, जो पहले दोनों देशों के बीच एक सुरक्षा परत का काम करता था। अब सीमा अधिक प्रत्यक्ष और संवेदनशील हो गई है।

यह टकराव केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक, जातीय और ऐतिहासिक कारकों का जटिल मिश्रण है। डूरंड रेखा का विवाद, पश्तून पहचान का प्रश्न, उग्रवादी संगठनों की गतिविधियां और आपसी अविश्वास, ये सभी कारक बार-बार तनाव को जन्म देते हैं।फिलहाल हालात नाजुक हैं। यदि कूटनीतिक संवाद नहीं बढ़ा तो यह सीमित झड़प व्यापक संघर्ष में बदल सकती है। दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए दोनों देशों का संयम और संवाद ही एकमात्र टिकाऊ रास्ता माना जा रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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