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मुंबई में मेयर की कुर्सी पर सियासी संग्राम, भाजपा-शिंदे खेमे में खींचतान, उद्धव ठाकरे का बड़ा दांव

मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई नगर निगम का मेयर पद हमेशा ही सत्ता का केंद्र रहा है, लेकिन इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प नजर आ रहा है। इसको लेकर राज्य में सियासी खींचतान जोरों पर दिखाई दे रही है। एक तरफ जहां भाजपा की सोच है कि उसका व्यक्ति बने तो दूसरी ओर शिंदे की शिवसेना ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। इसी बीच उद्धव ठाकरे ने मौके की नजाकत को देखते हुए ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरा खेल ही पलटता दिख रहा है।
हाल ही में हुए नगर निगम चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। महायुति गठबंधन के पास कुल 118 पार्षद हैं, जबकि मेयर बनने के लिए 114 मतों की जरूरत है। यानी बहुमत बहुत मामूली है। इसी कारण भाजपा और शिंदे गुट दोनों ही एक-दूसरे पर भरोसा करने को तैयार नहीं दिख रहे।
उद्धव ठाकरे का मतदान से पीछे हटना, भाजपा को बढ़त
राजनीतिक जमीन खो चुके उद्धव ठाकरे गुट ने इसी बीच ऐलान कर सभी को चौंका दिया है। ठाकरे ने कहा है कि यदि भाजपा का मेयर चुना गया, तो उनके पार्षद मतदान से दूर रहेंगे। इसका मतलब साफ है कि उद्धव भी नहीं चाहते हैं कि शिंदे का व्यक्ति मेयर बने। इधर राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह कदम अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के लिए रास्ता आसान कर सकता है, क्योंकि विपक्ष की ताकत कम हो जाएगी। मगर इसके पीछे उद्धव ठाकरे की यह रणनीति भी मानी जा रही है कि वे शिंदे गुट को नैतिक दबाव में लाना चाहते हैं।
गुटबाजी उभर कर आई सामने
शिंदे गुट ने अपने 29 पार्षदों को मुंबई के एक होटल में ठहरा दिया है, ताकि कोई टूट-फूट न हो। स्वयं एकनाथ शिंदे ने उनसे मुलाकात कर पार्टी के प्रति निष्ठा बनाए रखने का संदेश दिया। दूसरी ओर भाजपा ने भी अपने नवनिर्वाचित पार्षदों को अगले दस दिनों तक मुंबई से बाहर न जाने का निर्देश दिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के विदेश दौरे से लौटने के बाद मेयर पद के उम्मीदवार का नाम तय होने की संभावना है। तब तक राजनीतिक सरगर्मी और तेज़ रहने वाली है। मुंबई का मेयर पद केवल एक प्रशासनिक कुर्सी नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति में शक्ति-संतुलन का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस चुनाव का असर आने वाले विधानसभा समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

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