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क्लीन सिटी पर कलंकः जहरीले पानी ने निगल ली मासूम जिंदगी, इंदौर फिर शर्मसार

इंदौर। नए साल की पहली सुबह जहां उम्मीद और उत्साह लेकर आती है, वहीं इंदौर में यह दिन मातम में बदल गया। देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा पाने वाला इंदौर एक बार फिर जहरीले पानी की लापरवाही के कारण सवालों के घेरे में है। भागीरथपुरा में दूषित पानी ने एक पांच माह के मासूम की जान ले ली, जिसने पूरे शहर को झकझोर दिया।
इंदौर, जिसे बार-बार देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जाता रहा है, आज बुनियादी व्यवस्था की सबसे बड़ी नाकामी का सामना कर रहा है। भागीरथपुरा क्षेत्र में फैली जल-त्रासदी अब तक 13 लोगों की जान ले चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग बीमार हैं। इनमें से 25 की हालत गंभीर बताई जा रही है, जिन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया है।
सबसे हृदयविदारक मामला पांच माह के मासूम अव्यान की मौत का है। बताया जा रहा है कि डॉक्टर की सलाह पर बच्चे को बाहरी दूध दिया जा रहा था। दूध गाढ़ा होने के कारण उसे पतला करने के लिए नगर निगम के नल का पानी मिलाया गया, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि यही पानी जहर बन जाएगा। दूध पीते ही बच्चे की तबीयत बिगड़ गई, उल्टी-दस्त शुरू हुए और कुछ ही घंटों में मासूम ने दम तोड़ दिया।
अव्यान के पिता सुनील साहू का दर्द शब्दों में बयान करना मुश्किल है। उन्होंने बताया कि शादी के दस साल बाद मन्नतों के बाद यह संतान मिली थी। 8 जुलाई को जन्मा यह बच्चा पूरे परिवार की उम्मीद था, जिसे सिस्टम की लापरवाही ने छीन लिया। मां साधना सदमे में हैं और बार-बार बेसुध हो रही हैं।
यह सवाल बेहद गंभीर है कि आखिर भागीरथपुरा का पानी इतना जहरीला कैसे हो गया? क्या जल आपूर्ति की नियमित जांच नहीं की जाती? क्या नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ हादसे के बाद बयान देने तक सीमित है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने समय रहते कोई कदम नहीं उठाया। अब जब मौतें हो चुकी हैं, तब जांच और कार्रवाई की बातें की जा रही हैं। लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए यह सब बेमानी है।
यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है। अगर समय रहते पानी की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता, तो शायद 13 जिंदगियां बचाई जा सकती थीं। सवाल यह भी है कि क्या इस जल-जहर का सिलसिला यहीं थमेगा या इंदौर को और मासूमों की कुर्बानी देनी पड़ेगी?

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