कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) छोड़कर हाल ही में भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक को पश्चिम बंगाल से राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया। तीनों नेताओं का भाजपा के टिकट पर उच्च सदन पहुंचना ममता बनर्जी की पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
कैसे निर्विरोध चुने गए तीनों नेता?
राज्यसभा उपचुनाव के लिए नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि समाप्त होने के बाद मैदान में कोई अन्य उम्मीदवार नहीं बचा। इससे पहले 15 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच पूरी हो चुकी थी। निर्वाचन अधिकारी ने शुक्रवार को तीनों उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करते हुए उन्हें चुनाव प्रमाणपत्र सौंप दिया।
भाजपा में शामिल होते ही मिला राज्यसभा का टिकट
सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक ने 9 जुलाई को कोलकाता में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी। उसी दिन भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने उन्हें 24 जुलाई को प्रस्तावित राज्यसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया।
इन उपचुनावों की जरूरत तब पड़ी, जब तीनों नेताओं ने पिछले महीने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद राज्यसभा सदस्यता और पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
ममता बनर्जी के लिए क्यों बड़ा झटका?
तीनों नेताओं का भाजपा के टिकट पर दोबारा राज्यसभा पहुंचना टीएमसी के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। पार्टी छोड़ने के कुछ ही दिनों के भीतर उनका फिर से संसद पहुंचना यह संकेत देता है कि भाजपा अब पश्चिम बंगाल में अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम विधानसभा चुनाव में भाजपा की सफलता के बाद राज्य की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत भी है।
भाजपा की नई रणनीति का संकेत
भाजपा ने विधानसभा चुनाव के बाद पहली बार टीएमसी के पूर्व सांसदों को प्रमुख जिम्मेदारी देकर स्पष्ट किया है कि वह ऐसे नेताओं का स्वागत करने को तैयार है, जिन्हें राजनीतिक रूप से प्रभावशाली माना जाता है और जिन पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं। इसे पश्चिम बंगाल में संगठन विस्तार की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
सुखेंदु शेखर रॉय क्यों रहे चर्चा में?
सुखेंदु शेखर रॉय वर्ष 2012 से राज्यसभा में टीएमसी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और उन्हें पार्टी का प्रमुख संसदीय एवं कानूनी रणनीतिकार माना जाता था।
आरजी कर मेडिकल कॉलेज से जुड़े चर्चित दुष्कर्म एवं हत्या मामले के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से पार्टी नेतृत्व से जवाबदेही की मांग की थी। इसके बाद टीएमसी के भीतर उनके मतभेद खुलकर सामने आए। बाद में उन्होंने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सोशल मीडिया की कुछ पोस्ट भी हटा दी थीं।
सुष्मिता देव का राजनीतिक सफर
सुष्मिता देव असम से कांग्रेस की पूर्व लोकसभा सांसद और अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी हैं। वर्ष 2021 में उन्होंने टीएमसी का दामन थामा था। भाजपा में शामिल होने से पहले उन्होंने तृणमूल नेतृत्व पर कथित भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठाए थे।
वहीं, प्रकाश चिक बराइक भी टीएमसी के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे थे। उन्होंने भी हाल ही में पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण की।
बंगाल की राजनीति में नए संकेत
तीनों नेताओं का भाजपा के टिकट पर राज्यसभा पहुंचना केवल संसदीय बदलाव नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत भी माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस घटनाक्रम का असर टीएमसी और भाजपा के बीच राजनीतिक मुकाबले पर कितना पड़ता है।

