भोपाल को हमेशा गंगा-जमुनी तहजीब, भाईचारे और सामाजिक सौहार्द की राजधानी माना गया है। यहां की फिजा में अपनापन और अमन की खुशबू रही है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से एक कथित लव जिहाद प्रकरण को लेकर माहौल गरमाया हुआ है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कौन भोपाल की शांति और सामाजिक समरसता को बिगाड़ना चाहता है? घटनाक्रम पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि मामला अचानक नहीं भड़का। सोशल मीडिया पर लगातार संदेश प्रसारित हुए, भीड़ जुटाने की अपील की गई, पुलिस कमिश्नर कार्यालय का घेराव हुआ और अल्टीमेटम भी दिया गया। इसके बावजूद पुलिस-प्रशासन समय रहते हालात की गंभीरता को नहीं समझ सका। यदि शुरुआती स्तर पर संवाद, सख्ती और सतर्कता दिखाई जाती, तो शायद रात में हजारों लोगों की भीड़ सड़कों पर नहीं उतरती। शाम को कमिश्नर कार्यालय के घेराव से लेकर रात में पीरगेट और इमामी गेट पर हजारों लोगों की भीड़ जुटने तक पुलिस का तंत्र हालात को भांपने में नाकाम दिखा। जब तक प्रशासन सक्रिय हुआ, तब तक स्थिति तनावपूर्ण हो चुकी थी। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर खुफिया तंत्र और स्थानीय पुलिस इतनी बड़ी हलचल को समय रहते क्यों नहीं समझ सकी? आज सोशल मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि भीड़ को प्रभावित करने का सबसे बड़ा औजार बन चुका है। अफवाहें, अधूरी जानकारियां और भड़काऊ संदेश समाज में अविश्वास पैदा करते हैं। भोपाल जैसे शांत शहर में भी कुछ लोग धार्मिक भावनाओं को भड़काकर माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे तत्वों की पहचान कर सख्त कार्रवाई जरूरी है। किसी भी घटना पर विरोध जताना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन कानून हाथ में लेना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। यदि किसी युवक के साथ मारपीट हुई है तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन इसका फैसला सड़क पर जुटी भीड़ नहीं कर सकती। प्रशासन को भी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ कार्रवाई करनी होगी, ताकि किसी समुदाय में पक्षपात की भावना न बने। भोपाल की असली ताकत उसकी साझी संस्कृति और भाईचारा है। कुछ असामाजिक तत्व अगर शहर की फिजा खराब करने की कोशिश कर रहे हैं, तो समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर उन्हें बेनकाब करना होगा। नफरत की राजनीति और भीड़ की ताकत कभी स्थायी समाधान नहीं दे सकती। भोपाल को शांति, विश्वास और सौहार्द के रास्ते पर ही आगे बढ़ना होगा।
-मिलिंद ठाकरे

