इंदौर का चर्चित हनी ट्रैप मामला केवल ब्लैकमेलिंग या आपराधिक षड्यंत्र का मामला नहीं है, बल्कि यह राजनीति, अपराध और सत्ता के खतरनाक गठजोड़ की भयावह तस्वीर भी सामने ला रहा है। जिस तरह इस मामले में भाजपा से जुड़ी एक महिला पदाधिकारी का नाम सामने आया है और प्रभावशाली नेताओं, कारोबारियों तथा अधिकारियों को निशाना बनाने की बात जांच में निकल रही है, उससे साफ है कि अपराध अब केवल अंधेरी गलियों में नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों तक पहुंच चुका है। सबसे चिंताजनक यह है कि कथित तौर पर लोगों की कमजोरियों को हथियार बनाकर उन्हें ब्लैकमेल करने का संगठित नेटवर्क तैयार किया गया। वीडियो और ऑडियो के जरिए दबाव बनाना केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर हमला है। यदि जांच में यह साबित होता है कि प्रभावशाली लोगों को डराकर धन उगाही की जा रही थी, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा। इस मामले ने राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली पर भी बहस छेड़ दी है। किसी भी दल के लिए यह जरूरी है कि वह संगठन में शामिल लोगों की पृष्ठभूमि और गतिविधियों पर सतर्क निगरानी रखे। राजनीति यदि अवसरवाद और व्यक्तिगत लाभ का माध्यम बनती जाएगी, तो ऐसे तत्व संगठन की साख को लगातार नुकसान पहुंचाते रहेंगे। पुलिस जांच में देरी भी सवालों के घेरे में है। शिकायत मिलने के 19 दिन बाद एफआईआर दर्ज होना यह संकेत देता है कि प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में कार्रवाई का दबाव किस हद तक काम करता है। कानून का भय तभी प्रभावी होगा, जब कार्रवाई निष्पक्ष और समयबद्ध हो। श्वेता जैन द्वारा सरकारी गवाह बनने की इच्छा जताना इस पूरे नेटवर्क के कई और राज खोल सकता है। जरूरत इस बात की है कि जांच केवल कुछ गिरफ्तारियों तक सीमित न रहे, बल्कि यह पता लगाया जाए कि इस नेटवर्क के पीछे कौन लोग थे, किसे संरक्षण मिल रहा था और कितने लोग इसके शिकार बने। हनी ट्रैप जैसे मामले केवल अपराध नहीं, समाज की नैतिक गिरावट का संकेत भी हैं। सत्ता, लालच और निजी स्वार्थ का यह गठजोड़ लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। अब जिम्मेदारी पुलिस, राजनीति और समाज-तीनों की है कि ऐसे नेटवर्क को जड़ से खत्म किया जाए।
-मिलिंद ठाकरे

