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‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी’… खामोश हो गई मोहब्बत की वह आवाज, बशीर बद्र नहीं रहे

नई दिल्ली। आधुनिक उर्दू गजल को नई ज़ुबान, नई नर्मी और आम आदमी के दिल की धड़कन देने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे। 91 वर्ष की उम्र में आज दोपहर करीब 12 बजे उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्यिक दुनिया में गहरा सन्नाटा पसर गया। सोशल मीडिया पर शायर, साहित्यकार, कलाकार और उनके चाहने वाले उनके शेर साझा कर उन्हें नम आंखों से याद कर रहे हैं। बशीर बद्र लंबे समय से वे डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। याददाश्त कमजोर पड़ चुकी थी और अपनों को पहचानना भी मुश्किल हो गया था। बीते कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार गिर रही थी।

शाम को हो सकता है अंतिम संस्कार

परिजनों के मुताबिक उनका अंतिम संस्कार आज शाम किया जा सकता है, हालांकि समय अभी तय नहीं हुआ है। परिवार और करीबी लोग अंतिम तैयारियों में जुटे हैं।

जिसने गजल को महफिल से निकालकर लोगों के दिल तक पहुंचाया

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से वर्ष 1969 में स्नातकोत्तर करने वाले बशीर बद्र ने 12 अगस्त 1974 को मेरठ कालेज के उर्दू विभाग में बतौर प्राध्यापक अपनी सेवाएं शुरू कीं। वर्ष 1990 तक वे यहां अध्यापन कार्य से जुड़े रहे।1974 से 1990 का दौर उनकी शायरी का सबसे चमकदार समय माना जाता है। इसी दौरान उनकी गजलों ने देशभर के मुशायरों और साहित्यिक मंचों पर धूम मचाई। उन्होंने उर्दू शायरी को कठिन शब्दों से निकालकर आम बोलचाल की भाषा में ढाला, जिससे उनकी गजलें सीधे लोगों के दिलों में उतरती चली गईं।

दर्द, मोहब्बत और जिंदगी को अल्फाज़ देने वाला शायर

बशीर बद्र की शायरी में मोहब्बत की नरमी भी थी और जिंदगी की तल्खियां भी। उनके कई शेर आज भी लोगों की जुान पर हैं। जैसे-
‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो…’
और
‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूँ कोई बेवफा नहीं होता…’
उनके शेर सिर्फ मुशायरों की रौनक नहीं बने, बल्कि मोहब्बत और तन्हाई महसूस करने वाली हर पीढ़ी की आवाज बन गए।

साहित्य जगत में कभी न भरने वाली कमी

बशीर बद्र का जाना केवल एक शायर का जाना नहीं, बल्कि उर्दू गजल की उस नरम, सलीकेदार और दिल को छू लेने वाली परंपरा का एक बड़ा अध्याय खत्म होना है, जिसने लाखों लोगों को शब्दों से मोहब्बत करना सिखाया।

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