मुंबई/फिल्म रिव्यू: यश की फिल्म ‘टॉक्सिक’ बड़े स्केल, शानदार विजुअल्स और जबरदस्त एक्शन के साथ पेश की गई है। फिल्म में गैंगस्टर वर्ल्ड, ड्रग्स, परिवार, बदला और धोखे की कहानी है। यश का स्टारडम फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन कमजोर और उलझी हुई कहानी इसका मजा काफी कम कर देती है।
कहानी में क्या है?
फिल्म की कहानी 1940 के दशक के गोवा की पृष्ठभूमि में है, जहां ड्रग्स के कारोबार पर गैंग्स का दबदबा है। यश का किरदार राया इस दुनिया का बड़ा नाम है। परिवार में हुए धोखे और पुराने हिसाब-किताब के बाद कहानी उसके बेटे टिकट तक पहुंचती है। इसके बाद बदले और गैंगवार का सिलसिला शुरू होता है।
कॉन्सेप्ट दिलचस्प है, लेकिन कई किरदारों और घटनाओं को तेजी से जोड़ने के चक्कर में स्क्रीनप्ले उलझ जाता है। कई जगह यह समझना मुश्किल होता है कि कौन किसके साथ है और कहानी किस दिशा में बढ़ रही है।
यश और बाकी कलाकार
यश राया के किरदार में शानदार नजर आते हैं। उनका स्वैग, लुक, बॉडी लैंग्वेज और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को संभालते हैं। टिकट के रोल में भी उनका अलग अंदाज देखने को मिलता है।

नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुक्मिणी वसंत जैसी कलाकारों की मौजूदगी प्रभावशाली है, लेकिन उनके किरदारों को उतनी मजबूती नहीं दी गई।
डायरेक्शन और विजुअल्स
गीतू मोहनदास ने फिल्म को भव्य बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। पुराने दौर का गोवा, सेट, कॉस्ट्यूम, लाइटिंग और एक्शन सीक्वेंस शानदार हैं। सिनेमैटोग्राफी फिल्म का मजबूत पक्ष है।
वहीं तेज एडिटिंग और जरूरत से ज्यादा एक्शन कई जगह कहानी की पकड़ कमजोर कर देते हैं। रवि बसरूर का बैकग्राउंड स्कोर भी कुछ दृश्यों में जरूरत से ज्यादा हावी महसूस होता है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘टॉक्सिक’ में स्टारडम, स्टाइल और एक्शन भरपूर है, लेकिन कहानी उतनी मजबूत नहीं है। यश के फैंस को फिल्म पसंद आ सकती है, लेकिन मजबूत कहानी की उम्मीद रखने वाले दर्शक निराश हो सकते हैं।

