नई दिल्ली: भारत की मेजबानी में 18वें BRICS Summit की शुरुआत हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन किया। इस दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान समेत कई देशों के नेता दिल्ली में मौजूद हैं।
दुनिया में चल रहे युद्ध, बढ़ती energy prices और अमेरिका-चीन के बीच तनाव के बीच हो रहे इस सम्मेलन को अमेरिकी मीडिया भी काफी अहम मान रहा है। खास बात यह है कि कवरेज का बड़ा हिस्सा BRICS से ज्यादा भारत और चीन की बढ़ती भूमिका पर केंद्रित है।
शी जिनपिंग के भारत दौरे पर खास नजर
अमेरिकी मीडिया की नजर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे पर भी है। शी करीब सात साल बाद भारत आए हैं। 2020 में भारत-चीन सीमा पर हुए संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्तों में काफी तनाव आया था।
2024 के बाद दोनों देशों ने धीरे-धीरे रिश्ते सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाए। ऐसे में BRICS Summit के दौरान मोदी और शी की मौजूदगी को दोनों देशों के बीच चल रही इसी diplomatic process के अगले बड़े पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है।
आधी दुनिया की आबादी वाला समूह
BRICS का आकार पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। अब इसके 11 सदस्य देश दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। संगठन में अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक हित वाले देश होने की वजह से इनके बीच हर मुद्दे पर सहमति बनाना आसान नहीं है।
अमेरिकी मीडिया ने इसी अंतर को BRICS की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखा है। खासकर Ukraine और Middle East में चल रहे संघर्षों पर सदस्य देशों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
अमेरिका के लिए क्यों अहम है BRICS?
BRICS की बढ़ती आर्थिक ताकत भी पश्चिमी देशों का ध्यान खींच रही है। समूह के सदस्य वैश्विक संस्थाओं में Global South की ज्यादा भागीदारी चाहते हैं। कुछ सदस्य अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात भी करते रहे हैं। हालांकि, भारत BRICS को सीधे तौर पर anti-West या anti-US group बनाने के पक्ष में नहीं दिखता। प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन में भी इसे emerging economies के बीच cooperation बढ़ाने वाला मंच बताया है।
इस बार दिल्ली का BRICS Summit इसलिए भी खास है क्योंकि एक ही मंच पर भारत, चीन, रूस, ईरान और दूसरे बड़े देशों के नेता मौजूद हैं। अमेरिकी मीडिया की कवरेज से भी साफ है कि अब BRICS को केवल emerging economies के संगठन के रूप में नहीं, बल्कि बदलते global power balance के महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जा रहा है।

