भोपाल के एमपी नगर में करंट की चपेट में आकर भाजयुमो नेता और अधिवक्ता दिव्यऋषि तिवारी की मौत को सिर्फ एक हादसा मान लेना व्यवस्था के लिए सबसे आसान रास्ता होगा। असली सवाल हादसे से बड़ा है-जिस पोल को मौत के बाद कुछ घंटों में बेरिकेडिंग, त्रिपाल और चेतावनी पोस्टर से सुरक्षित कर दिया गया, वह खतरा मौत से पहले नजर क्यों नहीं आया?पड़ताल में सामने आया है कि अगस्त में इसी स्थान पर एक कर्मचारी को भी करंट का झटका लगा था। उसने भले ही पुलिस या नगर निगम में शिकायत दर्ज नहीं कराई, लेकिन घटना के बाद उस रास्ते से निकलना तक बंद कर दिया था। यानी खतरे के संकेत पहले से मौजूद थे। फिर भी व्यवस्था ने उन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत महसूस नहीं की।
मामले की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि पुलिस और नगर निगम के दावों में विरोधाभास है। पुलिस के अनुसार पिछले तीन-चार दिनों में इस स्थान पर सात से अधिक लोगों को करंट लगने की जानकारी सामने आई थी और शिकायतें भी की गई थीं। दूसरी ओर नगर निगम का कहना है कि उसे पोल में करंट आने की कोई शिकायत नहीं मिली। सवाल सीधा है-शिकायत हुई थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई और शिकायत नहीं हुई थी तो खतरे की निगरानी कौन कर रहा था? हादसे के बाद आसपास करीब आधा किलोमीटर क्षेत्र में खुले तार और असुरक्षित कनेक्शन मिलने की बात भी सामने आई है। इसका मतलब साफ है कि मामला केवल एक पोल का नहीं हो सकता। पूरे क्षेत्र में स्ट्रीट लाइट पोल, वायरिंग, अर्थिंग और विद्युत कनेक्शनों का सुरक्षा ऑडिट जरूरी है।
दिव्यऋषि तिवारी की मौत ने एक परिवार को अपूरणीय क्षति दी है। लेकिन अब जांच सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि पोल में करंट कैसे आया। यह भी तय होना चाहिए कि खतरे के संकेत मौजूद होने के बावजूद जिम्मेदार तंत्र ने आंखें क्यों मूंदे रखीं। हादसे के बाद बेरिकेड लगाना आसान है, लेकिन हादसा रोकना असली जिम्मेदारी है। व्यवस्था तब जागे, जब एक जिंदगी जा चुकी हो, तो सवाल केवल करंट वाले पोल का नहीं, पूरी जवाबदेही व्यवस्था का है।
-मिलिंद ठाकरे

