नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली के प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान मंगलवार को वकीलों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी ने अदालत का माहौल गर्म कर दिया। कारोबारियों की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी को संबोधित करते हुए मेहता ने कहा, ‘शुक्र है आपका माइक नहीं छीना गया।’ उनकी इस टिप्पणी पर वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कड़ी आपत्ति जताई और उन्हें संवैधानिक पद की गरिमा का ध्यान रखने की नसीहत दी।
माइक छीनने की पुरानी घटना पर तुषार मेहता का तंज
तुषार मेहता की टिप्पणी का संबंध पिछली सुनवाई की घटना से था। तब वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दे रहे थे। आरोप है कि सुनवाई के दौरान उनका माइक छीन लिया गया था। इसके बाद उन्होंने खुद को मामले की पैरवी से अलग कर लिया था।
मंगलवार को जब मुकुल रोहतगी दलील दे रहे थे और दूसरे पक्ष के वकील बीच में बोलने लगे, तब मेहता ने माइक वाली घटना का जिक्र करते हुए तंज कसा। उन्होंने कहा कि उनका माइक सुरक्षित दूरी पर है और कोई उसे नहीं छीन सकता।
मेनका गुरुस्वामी ने क्या कहा?
तुषार मेहता की टिप्पणी पर वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, ‘श्रीमान मेहता! आप एक संवैधानिक पद पर बैठे हैं। कृपया उसी पद की गरिमा के अनुरूप व्यवहार कीजिए।’
इस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अरुंधति काटजू ने भी प्रतिक्रिया दी। देखते ही देखते अदालत में वकीलों के बीच बहस तेज हो गई। इस घटनाक्रम ने प्रदर्शन से जुड़े मुख्य मामले की सुनवाई के बीच सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
प्रदर्शन की जगह पर किसी का स्थायी कब्जा नहीं हो सकता
सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ कर रही थी। इसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी समूह को किसी सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि अगर एक संगठन लगातार किसी जगह पर प्रदर्शन करता रहेगा तो किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन और दूसरे समूह अपनी आवाज कहां उठाएंगे? अदालत ने कहा कि विरोध प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर सार्वजनिक स्थान पर स्थायी कब्जा नहीं किया जा सकता।
कारोबारियों ने 2000 करोड़ के नुकसान का दावा किया
सुनवाई में कारोबारियों की ओर से मुकुल रोहतगी ने दावा किया कि प्रदर्शनों के कारण करीब 2000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि रामलीला मैदान के आसपास कई बड़े बाजार हैं, जहां व्यापारी, मजदूर और छोटे कारोबारी आजीविका चलाते हैं।
त्योहारों के दौरान कारोबार प्रभावित होने से दुकानदारों के साथ टेंपो चालकों और अन्य कामगारों को भी नुकसान हुआ।
हालांकि, जस्टिस बागची ने सवाल किया कि कारोबार में गिरावट के लिए सिर्फ प्रदर्शनकारियों को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है? उन्होंने कहा कि सड़क पर बैरिकेडिंग और प्रशासन की पाबंदियां भी व्यापार प्रभावित होने की वजह हो सकती हैं।
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संसद तक मार्च और प्रदर्शनकारियों की निगरानी पर बहस
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि बिना अनुमति भीड़ को संसद की ओर मार्च की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने जुलाई में CJP के प्रदर्शन का उदाहरण दिया, जिसमें एक दिन की अनुमति के बाद भी प्रदर्शनकारी 17 दिन तक बैठे रहे।
वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने कहा कि अगर रामलीला मैदान और जंतर-मंतर जैसे तय प्रदर्शन स्थलों पर भी आपत्ति होगी तो लोग अपनी बात कहां रखेंगे? वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रदर्शनकारियों की निगरानी और निजता का मुद्दा उठाया। इस पर मेहता ने कहा कि प्रदर्शन स्थल पर CCTV से निगरानी हो रही है।
चीफ जस्टिस ने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर मौजूद व्यक्ति की निजता की उचित अपेक्षा की एक सीमा होती है। फिलहाल प्रदर्शन के अधिकार, सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल, व्यापारिक नुकसान और निजता पर बहस जारी है।

