नई दिल्ली: मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में कुपोषण से बच्चों की मौतों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया है। CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने शुक्रवार को केंद्र सरकार और तीनों राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है।
कोर्ट ने यह नोटिस [अजब लाल लिलहारे बनाम भारत सरकार और अन्य] जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जारी किया। याचिका में कहा गया है कि आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चे गंभीर कुपोषण और रोकी जा सकने वाली बीमारियों के कारण रोज मर रहे हैं।
वकील ने कहा- रोज हो रही हैं मौतें, प्रशासन उदासीन
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वरुण ठाकुर ने बेंच के सामने कहा कि बुरी तरह प्रभावित ब्लॉकों में रोजाना मौतें हो रही हैं, जहां कुपोषण बड़े पैमाने पर फैला हुआ है।
अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को जानकारी देने के बावजूद प्रशासन उदासीन बना रहा। खसरा-रूबेला और गंभीर तीव्र कुपोषण (SAM) के घातक मेल ने विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों (PVTGs) के दर्जनों बच्चों की जान ले ली।
सिस्टम फेल्योर का आरोप, DMF फंड के दुरुपयोग का मुद्दा
वकील ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में सिस्टम की विफलता की ओर इशारा किया। उन्होंने बताया कि मेडिकल अधिकारियों की भारी कमी है, टीकाकरण अभियान सिर्फ कागजों पर हैं और आंगनवाड़ी केंद्रों से टेक-होम राशन और पोषण आपूर्ति पूरी तरह बंद है।
उन्होंने बेंच से डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) फंड के गलत इस्तेमाल और इस्तेमाल न होने की जांच का भी आग्रह किया। यह फंड कानूनी रूप से खनन से प्रभावित आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य, पेयजल और पोषण के लिए तय है।
संविधान के अनुच्छेदों के उल्लंघन का आरोप
बालाघाट के रहने वाले अजब लाल लिलहारे की याचिका में कहा गया है कि यह संकट संविधान के आर्टिकल 14 और 21 के साथ-साथ आर्टिकल 39(f) और 47 का भी उल्लंघन है। प्राइमरी हेल्थ सेंटर कई किलोमीटर दूर हैं, इमरजेंसी रेफरल और मोबाइल हेल्थ यूनिट नहीं पहुंच रही, जिससे लोग झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे हैं।
यह भी पढ़ेें: एमपी में ओबीसी आरक्षण पर सियासत तेज, सीएम मोहन यादव ने कांग्रेस को घेरा; महासभा जाएगी सुप्रीम कोर्ट
याचिका में ये मांगें
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि प्रभावित इलाकों को ‘महामारी रोग अधिनियम, 1897’ के तहत महामारी-संभावित क्षेत्र घोषित किया जाए, पीने का साफ पानी और इमरजेंसी न्यूट्रिशन उपलब्ध कराया जाए और ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ जैसी योजनाओं को पूरी तरह लागू किया जाए। साथ ही मृत बच्चों के परिवारों के लिए जवाबदेही और मुआवजे की मांग भी की गई है।

