35 लाख के भवन पर डाका! जनपद पंचायत किरनापुर के अंतर्गत ग्राम पंचायत देवगांव का मामला; जांच अधिकारी भगवान सिंह और वानेश्वर बासेन की सरपंच लक्ष्मण लेले व सचिव ठाकरे से जुगलबंदी, नाममात्र की वसूली कर दबाईं CM हेल्पलाइन की 4 शिकायतें
किरनापुर/बालाघाट: शासन की राशि को अपनी बपौती समझकर डकारने वाले भ्रष्ट तंत्र का एक ऐसा सनसनीखेज कारनामा सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक महकमे की साख को मटियामेट कर दिया है। मामला जनपद पंचायत किरनापुर के अंतर्गत ग्राम पंचायत देवगांव में 35 लाख रुपये की लागत से बने एक शासकीय भवन में हुए महाघोटाले और उसके बाद शुरू हुए ‘सेटिंग-गेम’ से जुड़ा है। इस पूरे खेल में सबसे शर्मनाक भूमिका जांच की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों, देवगांव के सरपंच लक्ष्मण लेले और सचिव ठाकरे की सामने आ रही है, जिन्होंने निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय मिलकर भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का रास्ता चुना।
जनता के पैसों की इस खुली लूट को छिपाने के लिए जांच अधिकारी भगवान सिंह और वानेश्वर बासेन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शिकायतकर्ता द्वारा 3 से 4 बार लगातार शिकायत करने के बावजूद, इन जांच अधिकारियों ने मिलकर दोषी सरपंच लक्ष्मण लेले और सचिव ठाकरे को पूरी तरह से बचा लिया। खुद को पाक-साफ साबित करने और मामले को रफा-दफा करने के लिए इन अधिकारियों ने सरपंच-सचिव से सांठगांठ कर महज नाममात्र की राशि वसूल की और जांच की इतिश्री कर दी। वहीं, अपनी गर्दन बचाने के लिए मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (CM Helpline) पर दर्ज 4 महत्वपूर्ण शिकायतों को बिना किसी ठोस निराकरण के जबरन ‘फोर्स क्लोज’ (बंद) करवा दिया गया।
भगवान सिंह और बासेन की ‘जुगलबंदी’ से सरपंच लक्ष्मण लेले और सचिव ठाकरे को मिला अभयदान!
तकनीकी मापदंडों को ताक पर रखकर बनाए गए इस 35 लाख के भवन में जब भ्रष्टाचार की परतें खुलीं, तो असली गाज दोषी सरपंच लक्ष्मण लेले और सचिव ठाकरे पर गिरनी चाहिए थी। उनके खिलाफ वित्तीय गबन का आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक, जांच अधिकारी भगवान सिंह और वानेश्वर बासेन ने अपनी जवाबदेही से बचने के लिए इन रसूखदारों के साथ पर्दे के पीछे का खेल खेला।
खुद को सही साबित करने के लिए कागजों पर तो रिकवरी (वसूली) दिखाई गई, लेकिन वह राशि इतनी कम (नाममात्र की) है जो ऊंट के मुंह में जीरा समान है। इस नाममात्र की वसूली ने साफ कर दिया है कि इन अधिकारियों का मकसद केवल कागजी खानापूर्ति करना था, शासन के नुकसान की वास्तविक भरपाई करना या दोषियों को जेल भेजना नहीं।
3-4 बार शिकायत पर भी नहीं पसीजा दिल, खुद को सच्चा बताने का खेल
जागरूक नागरिकों और शिकायतकर्ता ने इस महाघोटाले के खिलाफ एक या दो बार नहीं, बल्कि 3 से 4 बार पुख्ता सबूतों के साथ शिकायतें दर्ज कराईं। हर बार उम्मीद थी कि उच्च स्तर से नियुक्त यह जांच दल निष्पक्षता से काम करेगा और देवगांव पंचायत के इस गबन का भंडाफोड़ करेगा।
लेकिन भगवान सिंह और वानेश्वर बासेन ने जांच अधिकारी बनने के बजाय ‘बचावकर्ता’ की भूमिका अपना ली। उन्होंने हर शिकायत को विभाग के लिए खतरा माना और शिकायतकर्ता को ही गलत साबित करने की पुरजोर कोशिशें कीं। सरपंच-सचिव से इन अधिकारियों की सांठगांठ इतनी मजबूत थी कि हर बार जांच रिपोर्ट को इस तरह से घुमाया गया जिससे यह साबित हो सके कि विभाग ने ‘उचित कार्रवाई’ कर दी है।
CM हेल्पलाइन का मखौल: 4 शिकायतें जबरन दफन
जब स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं हुई, तो मामला सूबे के मुखिया के दरबार यानी CM हेल्पलाइन तक पहुंचा। एक के बाद एक 4 गंभीर शिकायतें दर्ज हुईं। लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी थीं कि इन जांच अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर नीचे बैठे अमले ने मुख्यमंत्री की इस महत्वाकांक्षी योजना को ही ठेंगा दिखा दिया। अधिकारियों ने अपनी रैंकिंग सुधारने और मामले को ठंडे बस्ते में डालने के लिए शिकायतकर्ता की असंतुष्टि और विरोध के बावजूद चारों शिकायतों को कागजी हेराफेरी कर जबरन बंद (Force Close) कर दिया।
बड़ा सवाल: सीईओ ममता कुलस्ते के आते ही जगी थीं उम्मीदें, पर जांच के नाम पर सिर्फ ‘कागजी हवाबाजी’ और ‘रटे-रटाए शब्द’!
इस पूरे मामले में जनपद पंचायत की मुखिया की कार्यप्रणाली भी अब गंभीर सवालों के घेरे में है। जनपद पंचायत सीईओ ममता कुलस्ते के कार्यभार संभालते ही क्षेत्र के ग्रामीणों में एक बड़ी उम्मीद जगी थी। लोगों को लगा था कि अब पंचायतों में होने वाले भ्रष्टाचार की शिकायतों पर नियमों के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जाएगी और दोषियों को सजा मिलेगी। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट निकली।
गोलमोल जवाब और कागजी खानापूर्ति।
ग्रामीणों का आरोप है कि अब शिकायतों पर जांच के नाम पर सिर्फ गोलमोल जवाब थमा दिया जाता है। सीईओ के अधीनस्थ अधिकारी (जैसे भगवान सिंह और वानेश्वर बासेन) बेखौफ होकर पंचायत के भ्रष्ट अधिकारियों और सरपंच-सचिव से सांठगांठ कर रहे हैं और शिकायतों का पूरी तरह से सत्यानाश कर रहे हैं।
शासकीय पोर्टल पर खुली धांधली, फिर भी साहब मौन।
हैरानी की बात यह है कि सरकारी पोर्टल पर भ्रष्टाचार और शिकायतों की स्थिति खुलेआम दिखाई देती है, लेकिन जब इन शिकायतों के निरीक्षण या कार्रवाई को लेकर बात की जाती है, तो उनके पास केवल कुछ ‘रटे-रटाए शब्द’ होते हैं। इन रटे-रटाए वाक्यों को बोलकर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
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क्या ग्रामीणों की शिकायतें फालतू हैं?
लगातार शिकायतों के बाद भी आज तक किसी भी भ्रष्ट अधिकारी या कर्मचारी पर कोई बड़ी गाज नहीं गिरी है। ऐसे में अब देवगांव के ग्रामीण यह पूछने पर मजबूर हैं कि क्या वाकई में ग्रामीणों द्वारा की जाने वाली शिकायतें फालतू हैं? या फिर जनपद के अधिकारी सिर्फ इन शिकायतों का इंतजार करते हैं, ताकि शिकायत आते ही वे जांच में लीपापोती का खेल खेलें, कागजी हवाबाजी करें और शिकायतों को चुपचाप क्लोज (बंद) करके अपनी जेबें गर्म कर लें?
अब गेंद जिला कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ के पाले में है। देखना होगा कि क्या वे इस ‘जनपद सीईओ-जांच अधिकारी-सरपंच-सचिव’ के त्रिकोण वाले भ्रष्टाचार गठजोड़ को तोड़ पाते हैं या फिर 35 लाख की यह डकैती फाइलों में बंद होकर रह जाएगी।

