जहरीली शराब से दो दर्जन लोगों की मौत के बाद मोहन सरकार ने कलेक्टरों-पुलिस अधीक्षकों को हटाया, आबकारी अधिकारियों को निलंबित किया और शराब विक्रेताओं को जेल भेजा। लेकिन जहरीली शराब का कारोबार रोकने में नाकामी की जवाबदेही जिला अधिकारियों तक ही क्यों सीमित है? प्रदेश में शराब कारोबार की निगरानी करने वाले आबकारी विभाग के शीर्ष अधिकारियों और संभावित राजनीतिक संरक्षकों की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। आबकारी विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ शराब से कमाई करना नहीं, बल्कि अवैध शराब की बिक्री रोकना भी है।
देवास और सागर की घटनाएं बताती हैं कि निगरानी व्यवस्था की विफलता की तह तक जाना जरूरी है। अवैध शराब लोगों तक कैसे पहुंची, शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई और आपूर्ति रोकने में विभाग क्यों नाकाम रहा? इन सवालों के जवाब केवल निलंबन और तबादलों से नहीं मिल सकते। सवाल किसी अधिकारी को पहले से दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि जांच की सीमा पद और प्रभाव देखकर तय न हो। यदि विफलता के लिए शीर्ष स्तर पर भी जिम्मेदारी बनती है, तो वहां तक कार्रवाई पहुंचनी चाहिए। जांच में स्थानीय प्रभावशाली लोगों और सफेदपोशों की संभावित भूमिका भी खंगाली जानी चाहिए।
कहीं अवैध कारोबार को राजनीतिक संरक्षण तो नहीं मिला? क्या किसी ने कार्रवाई में बाधा डाली? हालांकि सिर्फ आशंका के आधार पर किसी रसूखदार पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती? लेकिन रसूख के कारण किसी को जांच से बाहर रखना भी उचित नहीं है। मोहन सरकार के सामने चुनौती पूरे अवैध शराब नेटवर्क का पर्दाफाश करने की है। जांच निष्पक्ष हो, दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों, कारोबारियों और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई की जाए। साथ ही, निगरानी तंत्र की खामियां दूर करने के ठोस उपाय भी सामने आएं। शराब का राजस्व नागरिकों की जिंदगी से बड़ा नहीं हो सकता। दो दर्जन मौतों के बाद सरकार की जवाबदेही प्रशासनिक फेरबदल से पूरी नहीं होती। पीडि़तों को न्याय तभी मिलेगा, जब यह स्पष्ट होगा कि जहरीली शराब लोगों तक कैसे पहुंची और उसे रोकने में किस स्तर पर चूक हुई?
-मिलिंद ठाकरे

