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संपादकीय:भोपाल में नशे का नेटवर्क बेखौफ, पुलिस का खुफिया तंत्र कहां?

भोपाल की पहचान अब तक एक शांत और सुरक्षित राजधानी के रूप में रही है, लेकिन नशे के कारोबार से जुड़ी लगातार सामने आ रही घटनाएं इस पहचान पर सवाल खड़े कर रही हैं। राजधानी का आईएसबीटी अब नशे के सौदागरों के लिए एक मुफीद रास्ता बनता दिखाई दे रहा है। लंबी दूरी की बसों में आम यात्रियों की तरह सफर कर रहे तस्कर बेखौफ होकर मादक पदार्थों की खेप भोपाल पहुंचा रहे हैं। रविवार को राजस्व आसूचना निदेशालय (डीआरआई) की कार्रवाई में दिल्ली से बस के जरिए भोपाल पहुंचे दो यात्रियों के पास से 4.321 किलोग्राम एमडी (एम्फेटामाइन) की बरामदगी इस खतरे की गंभीरता बताने के लिए काफी है। चिंता इसलिए भी गहरी है कि अक्टूबर से नवंबर की शुरुआत तक महज एक महीने में आईएसबीटी से मादक पदार्थों की यह तीसरी बड़ी बरामदगी है।

इससे पहले 14 और 20 अक्टूबर को भी इसी बस टर्मिनल से नशे की खेप पकड़ी जा चुकी है। लगातार तीन बड़ी बरामदगियों को महज संयोग कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये घटनाएं साफ संकेत दे रही हैं कि तस्करों ने राजधानी तक नशा पहुंचाने के लिए बसों के रास्ते को अपनी आपूर्ति शृंखला का अहम हिस्सा बना लिया है।लेकिन सवाल केवल पकड़ी गई खेपों का नहीं, बल्कि उस पूरे नेटवर्क का है जो इनके पीछे सक्रिय है। दिल्ली से नशे की खेप भेज कौन रहा है? भोपाल में इसे रिसीव करने वाले चेहरे कौन हैं? यहां इसके खरीदार कौन हैं और राजधानी में नशे का कारोबार किन लोगों के सहारे फल-फूल रहा है? जब एक महीने में तीन बड़ी खेपें पकड़ी गई हैं तो यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि इससे पहले कितनी खेपें बिना किसी रोक-टोक के अपने ठिकानों तक पहुंच चुकी होंगी। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल भोपाल पुलिस की निगरानी और खुफिया व्यवस्था को लेकर है। तीनों बड़ी कार्रवाइयां डीआरआई ने की हैं। आखिर स्थानीय पुलिस का खुफिया तंत्र कहां है? क्या उसे राजधानी में पनप रहे नशे के नेटवर्क की भनक नहीं लगी, या तस्करों ने उसकी निगरानी व्यवस्था से बच निकलने का रास्ता खोज लिया है?

दूसरे राज्यों से आने वाली खेपों पर केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई हो रही है, जबकि स्थानीय पुलिस की सक्रियता इन घटनाओं में सामने नहीं आई है। यह स्थिति आत्ममंथन की मांग करती है। नशे के कारोबार के खिलाफ लड़ाई केवल समय-समय पर खेप पकड़ने और कुछ तस्करों को गिरफ्तार करने से नहीं जीती जा सकती। असली कार्रवाई तब मानी जाएगी, जब इस अवैध कारोबार की पूरी आपूर्ति शृंखला ध्वस्त हो। जांच दिल्ली के सप्लायरों से आगे बढ़कर भोपाल के स्थानीय संपर्कों, खरीदारों, वित्तीय लेनदेन और इस नेटवर्क को संरक्षण देने वाले लोगों तक पहुंचनी चाहिए। आईएसबीटी के साथ रेलवे स्टेशन और दूसरे प्रवेश मार्गों पर भी प्रभावी निगरानी जरूरी है। बस ऑपरेटरों, संदिग्ध आवाजाही और खुफिया सूचनाओं के बीच बेहतर समन्वय भी स्थापित करना होगा। भोपाल को नशे के कारोबार का नया गलियारा बनने से रोकना पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है। राजधानी की सुरक्षा केवल सड़कों पर पुलिस की मौजूदगी से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उन अपराधी नेटवर्कों पर समय रहते चोट करने से होती है जो शहर की शांति और नई पीढ़ी के भविष्य को निशाना बना रहे हैं। लगातार पकड़ी जा रही खेपें चेतावनी दे रही हैं। अब सवाल यह नहीं कि नशे की खेप कहां से आ रही है, बल्कि यह है कि राजधानी में उसके स्वागत के लिए कौन खड़ा है और उसे रोकने वाली व्यवस्था अब तक कहां है?

-मिलिंद ठाकरे

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