इंदौर: मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर चर्चा में है। इसके अतीत से लेकर वर्तमान विवाद तक की कहानी अब तस्वीरों और 24 ऐतिहासिक पड़ावों के जरिए पेश की गई है। यह प्रदर्शनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बैठक के दौरान लगाई गई है।
‘भोजशाला के प्रत्यक्ष प्रमाण’ नाम से विशेष सेक्शन तैयार
इंदौर के डेली कॉलेज परिसर में आयोजित प्रदर्शनी में ‘भोजशाला के प्रत्यक्ष प्रमाण’ नाम से विशेष सेक्शन तैयार किया गया है। इसमें भोजशाला के स्थापत्य, शिलालेखों, स्तंभों, धार्मिक प्रतीकों और पुरातात्विक अवशेषों की तस्वीरें प्रदर्शित की गई हैं।
ऐतिहासिक घटनाक्रमों को 24 अध्यायों में समझाने की कोशिश
इन तस्वीरों के जरिए भोजशाला के इतिहास और उससे जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक घटनाक्रमों को 24 अध्यायों में समझाने की कोशिश की गई है। प्रदर्शनी में खिलजी के आक्रमण से लेकर भोजशाला के वर्तमान विवाद तक के पहलुओं को शामिल किया गया है।
प्रदर्शनी की खासियत यह है कि भोजशाला के इतिहास को किसी एक घटना तक सीमित न रखते हुए राजा भोज के शासनकाल और स्थापना से लेकर मध्यकालीन आक्रमणों, वाग्देवी की प्रतिमा के लंदन पहुंचने, अंग्रेजों के पुरातात्विक अध्ययन और आजादी के बाद हुए आंदोलनों तक क्रमवार दिखाया गया है।
पहला अध्याय ‘धारा नगरी के राजा’ शीर्षक से शुरू होता है
प्रदर्शनी का पहला अध्याय ‘धारा नगरी के राजा’ शीर्षक से शुरू होता है। इसमें मालवा की प्राचीन राजधानी धार और परमार वंश के राजा भोज का परिचय दिया गया है। राजा भोज को पराक्रमी शासक के साथ कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान और शिक्षा का संरक्षक बताया गया है।
दूसरे अध्याय ‘मां सरस्वती के वरद पुत्र’ में वर्ष 1034 में भोजशाला (सरस्वती कंठाभरण विश्वविद्यालय) की स्थापना का उल्लेख है।
देश के अलग-अलग हिस्सों से आए शिल्पकार
आगे के अध्यायों में भोजशाला के स्थापत्य, संस्कृत शिलालेखों, देवी वाग्देवी की प्रतिमा और प्राण प्रतिष्ठा के लिए हुए यज्ञ का विवरण दिया गया है। प्रदर्शनी के अनुसार, देश के अलग-अलग हिस्सों से आए शिल्पकारों ने यहां मूर्तियों और स्तंभों का निर्माण किया था।
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आधुनिक विवाद और आंदोलनों का क्रमवार विवरण
प्रदर्शनी के अंतिम हिस्से में भोजशाला से जुड़े आधुनिक विवाद और आंदोलनों का क्रमवार विवरण दिया गया है। इसमें वर्ष 1936 में महाराजा के स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना की अनुमति दिए जाने के बाद परिसर में नमाज को लेकर विवाद शुरू होने का दावा किया गया है।
इसके बाद 21 से 23 दिसंबर 1943 के बीच कमालुद्दीन चिश्ती का पहला उर्स आयोजित होने, विरोध और तनाव की स्थिति बनने तथा भोजशाला के मुख्य द्वार के बाहर कब्रिस्तान बनाए जाने के आरोपों का उल्लेख है।
वर्ष 1952 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा की ओर से श्री महाराजा भोज स्मृति वसंतोत्सव समिति के गठन को हिंदू समाज के जनजागरण से जोड़कर दिखाया गया है। इसी वर्ष भोजशाला से जुड़े मामले को केंद्र सरकार द्वारा पुरातत्व विभाग को सौंपे जाने का भी जिक्र है।
प्रदर्शनी में वर्ष 1991 से शुरू हुए मंगलवार सत्याग्रह को विशेष स्थान दिया गया है। इसमें बताया गया है कि 4 फरवरी 1991 से भोज उत्सव समिति ने भोजशाला में पूजा के अधिकार की मांग को लेकर प्रत्येक मंगलवार सत्याग्रह शुरू किया था।
वर्ष 1996 के विवाद और उसके बाद हुए अस्थायी समझौते का भी उल्लेख है। इसके तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज की अनुमति दिए जाने की व्यवस्था का विवरण दिया गया है।

