भाजयुमो जिलाध्यक्ष अमन गांधी पर FIR कराने के मामले मे पीछे हटीं विधायक अनुभा मुंजारे
बालाघाट: भाजपा युवा मोर्चा के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष अमन गांधी की नियुक्ति की रात ही शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर रहा है। अमन गांधी द्वारा अपनी ही भाभी पूजा गांधी के साथ कथित मारपीट, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी के आरोपों ने अमन गांधी को विवादों के घेरे में ला दिया है।
पीड़िता पूजा गांधी ने आरोप लगाया है कि 29 अक्टूबर की रात अमन गांधी, उनके पिता कुलदीप गांधी और अन्य परिजनों ने उनके तथा उनके पति के साथ मारपीट की। पीड़िता ने अपनी और अपने छह वर्षीय बच्चे की सुरक्षा की गुहार लगाते हुए कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उनका दावा है कि पिछले छह वर्षों से पारिवारिक प्रताड़ना का सिलसिला जारी है।
इस मामले ने उस समय राजनीतिक मोड़ ले लिया, जब 3 नवंबर को बालाघाट विधायक अनुभा मुंजारे पीड़िता और उनके पति को लेकर कोतवाली थाने पहुंचीं। उन्होंने पुलिस अधिकारियों से दो से तीन घंटे तक चर्चा कर अमन गांधी के खिलाफ तत्काल प्राथमिकी दर्ज करने और पीड़ित परिवार को सुरक्षा देने की मांग की। इस दौरान विधायक का तेवर भी काफी आक्रामक नजर आया।
उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि FIR दर्ज नहीं की गई तो विधायक अनुभा मुंजारे खुद धरने पर बैठेंगी। जिसके बाद जानकारी सामने आई कि थाना प्रभारी कोतवाली द्वारा 4 नवंबर को 12 बजे तक FIR दर्ज करने की बात कही थी। इसके बाद अनुभा मुंजारे ने कहा था कि अमन गांधी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई तो वे पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए धरने पर बैठेंगी। लेकिन सवाल यह है कि विधायक की यह चेतावनी महज राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह गई ? जिस संघर्ष का भरोसा पीड़िता को दिलाया गया था, उसके अगले दिन ही हवा निकल गई ?
जब विधायक स्वयं पीड़िता को लेकर थाने पहुंची थीं और पुलिस कार्रवाई की मांग और धरने तक की चेतावनी दी थी, तब लगा था कि वह पीड़िता के मामले में निर्णायक लड़ाई लड़ेंगी। लेकिन अगले दिन ही उन्होंने इस मामले में यूटर्न लेते हुए चुप्पी साध ली। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या विधायक अपनी चेतावनी पर कायम क्यों नहीं रह पाईं ? क्या पुलिस प्रशासन के सामने उनका विरोध सिर्फ कुछ घंटों की सक्रियता तक सीमित था ? आखिर ऐसा क्या हुआ कि न्याय के लिए सड़क पर उतरने का ऐलान करने वाली विधायक दूसरे दिन मौन हो गईं ? पीड़िता को जिस राजनीतिक समर्थन से न्याय की उम्मीद जगी थी, वह अब सवालों के घेरे में है।
पब्लिसिटी, समझौता या दबाव ?
अब जनता में इस विषय को लेकर कई सवाल होने लगे हैं और जनचर्चा यह होने लगी है कि विधायक अनुभा मुंजारे ने 3 लाख रुपये लेकर मामले से पीछे हट गईं ? तो वहीं यह जनचर्चा भी है कि इस मामले से पीछे हटने के लिए उन पर राजनीतिक दबाव भी बनाया गया है ? और यह बात जनचर्चा में है कि अनुभा मुंजारे पब्लिसिटी पाने के लिए आए दिन इस तरह की बयानबाजी करती रहती हैं और बाद में पीछे हट जाती हैं ? हालांकि आधिकारिक रूप से इन आरोपों की पुष्टि होना बाकी है।
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इस विषय में विधायक अनुभा मुंजारे से फोन पर जानकारी लेने के लिए उनके मोबाइल नंबर 94254 48077 पर कॉल किया गया था, परंतु फोन पर बात नहीं हो सकी। राजनीतिक गलियारों में विधायक के पीछे हटने को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं।
अब अनुभा मुंजारे को यह स्पष्ट करना होगा कि पीड़िता को न्याय दिलाने का उनका संकल्प वास्तव में कितना मजबूत है। सवाल केवल एक परिवार को न्याय दिलाने का नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और जनता के भरोसे का भी है। क्योंकि राजनीति में बयान देना आसान है, लेकिन न्याय के लिए अपने वादे पर डटे रहना ही असली जनप्रतिनिधित्व की पहचान है।

