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राष्ट्रवाद की नई राह, क्या बदलेंगे अल्पसंख्यकों के स्वर?

मप्र में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच द्वारा अल्पसंख्यकों को राष्ट्रवादी विचारधारा से जोड़ने के लिए प्रस्तावित अभियान एक संगठनात्मक पहल नहीं, सामाजिक और वैचारिक संवाद की नई कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े इस मुस्लिम मंच का उद्देश्य उन दूरियों को कम करना है, जो वर्षों से धारणाओं, आशंकाओं और राजनीतिक विमर्श के कारण बनी रही हैं। भोपाल, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर जैसे प्रमुख केंद्रों से लेकर अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों तक, इस अभियान का विस्तार यह संकेत देता है कि प्रयास व्यापक स्तर पर प्रभाव छोड़ने की मंशा से किया जा रहा है। मंच के पदाधिकारियों का दावा है कि समय के साथ मुस्लिम समाज में संघ के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आया है और अब संवाद के नए द्वार खुल रहे हैं। हालांकि, इस पहल को केवल एकतरफा दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। भारतीय लोकतंत्र में विविधता और बहुलता इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है। ऐसे में किसी भी विचारधारा को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचाने का प्रयास स्वागत योग्य हो सकता है, बशर्ते उसमें संवाद, सहमति और सम्मान का संतुलन बना रहे। सवाल यह भी है कि क्या यह अभियान वास्तव में भरोसे की खाई पाट पाएगा या फिर यह केवल राजनीतिक विमर्श का एक नया अध्याय बनकर रह जाएगा? यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस तरह के प्रयासों के साथ सियासत का सक्रिय होना स्वाभाविक है। विभिन्न राजनीतिक दल इसे अपने-अपने नजरिए से देखेंगे और प्रतिक्रिया देंगे। लेकिन असली कसौटी यही होगी कि जमीनी स्तर पर यह पहल कितनी स्वीकार्यता हासिल करती है और क्या यह समाज में आपसी विश्वास को मजबूत कर पाती है। यह अभियान एक अवसर है संवाद का, समझ का और सामाजिक समरसता को नई दिशा देने का। यदि इसे ईमानदारी, पारदर्शिता और परस्पर सम्मान के साथ आगे बढ़ाया गया, तो यह केवल एक संगठन का कार्यक्रम न रहकर समाज में सकारात्मक बदलाव की मिसाल भी बन सकता है।

-मिलिंद ठाकरे

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